आज दोपहर में एकांत में बैठा था, खबर आयी जनेश्वर जी नहीं रहे. मेरे साथ सांसद श्री आर. के. पटेल जी, श्रीमती जया प्रदा जी, पूर्व सांसद श्री अखिलेश सिंह जी और विधायक श्री मदन चौहान जी भी बैठे हुए थे. खबर सुन कर मेरा मन अकुलाहट से छटपटा गया और मुझे उनके साथ की गयी अंतिम मुलाक़ात याद आ गयी. जब उन्होंने कहा था, समाजवादी बनो और गरीब/अतिपिछड़ों के पास जाओ. मैने यह बात आर.के पटेल जी को बताई तो वह कहने लगे, दोनों गुर्दों के बिना, उल्टी करते हुए तपती दोपहर में मेरे चुनाव प्रचार में आप आये थे, हर तरह से मेरी मदद की. मै पिछड़ा हूँ, गरीब हूँ पर आपकी मदद से सांसद बन गया. वह बोले इस समय पार्टी के चुने हुए सांसदों को आपके साथ दिखने में डर होगा परन्तु मुझे कोई डर नहीं है. मुझे तत्काल भाई अरविन्द सिंह गोप जी की याद आ गयी जो पिछले एक दशक से मेरे साथ साये की तरह रहते थे पर आजकल न जाने कहाँ गायब हो गए है? मुझे लगता है कि यदि गरीब और पिछड़े लोगों की मदद करो तो वह कभी नहीं भूलते है. जनेश्वर जी की यह सलाह कितनी सही और सच्ची थी, यह मुझे आर.के. पटेल जी की उपस्थिति से पता चला.

खबर मिलने के बाद हम लोगो ने तुरंत इलाहाबाद जाने का फैसला लिया. कुछ लोगो ने बताया की भाई आज़म खान साहब का बयान आ रहा है, मैने कहा कि बीमारी में और राज्यसभा में निर्वाचन के दौरान मेरे द्वारा की गयी मदद और सेवा का मेरी ब्लॉग में मैने मात्र जिक्र ही तो किया था. फिर “बंद मुट्ठी खुली जुबान” तो जनेश्वर जी जैसे समाजवादी पुरोद्धा का पुराना नारा है और भाई आज़म खान के बारे जनेश्वर जी की क्या सोच थी, मै सार्वजनिक नहीं करना चाहता हूँ क्यूंकि जनेश्वर जी अब नहीं रहे लेकिन नेता जी को यह भलीभाती पता है. Zee TV-U.P में एक सस्ती राजनीति से प्रेरित खबर आयी है, “यह वही जनेश्वर है जिनके एक फोन पर मुलायम सिंह ने अमर सिंह को पार्टी से निकाल दिया”. बिलकुल नहीं यह वह जनेश्वर है जो जन आन्दोलन में जेल में पड़े रहे और अपनी पत्नी की मृत्यु पर घर भी नहीं जा पाए. यह वो जनेश्वर है जो तत्कालीन प्रधानमंत्री पं नेहरू की बहन श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित से चुनाव लड़ रहे थे परन्तु किसी आन्दोलन के मसले में जेल चले गए थे. श्रीमती पंडित ने कहा, जब तक जनेश्वर छोड़े नहीं जायेंगे मै चुनाव नहीं लडूंगी. श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह जी और श्री चंद्रशेखर जी जैसे राजनैतिक पुरोद्धाओ के खिलाफ भी वह चुनाव लड़े थे और वी पी सिंह जी को तो उन्होंने हराया भी था और उनकी कैबिनेट में मंत्री भी रह कर साथ साथ काम भी किया था. जब वी.पी. सिंह जी की सरकार को गिरा कर कांग्रेस की मदद से चंद्रशेखर जी की सरकार बनाने की कवायत चल रही थी तो जनेश्वर जी इसके सख्त खिलाफ थे. परन्तु पार्टी और नेतृत्व के प्रति समर्पण का यह हाल था कि मुलायम सिंह जी के आदेश को सर-माथे पर लगाया. मोरार जी भाई की सरकार को गिरा कर जब चरण सिंह जी की सरकार बनाने की कवायत शुरू हुई तो उस समय जनेश्वर जी बीमारी की हालत में AIIMS के ICU में भर्ती थे. उनसे पूंछे बिना लोकबन्धु राजनरायण जी ने मंत्री-परिषद् से जनेश्वर जी के इस्तीफे की घोषणा कर दी. चंद्रशेखर जी जनेश्वर जी के पास गए और उनसे पूंछा कि क्या उनके त्यागपत्र की घोषणा उनकी सहमति से की गयी है? जनेश्वर जी ने कहा, बिलकुल नहीं मै तो यहाँ बीमार पड़ा हूँ, चंद्रशेखर जी ने कहा तब आप इसका खंडन कर दीजिये. जनेश्वर जी का उत्तर था, त्यागपत्र का खंडन तो मै कर दूँ पर अपने नेता राजनरायण जी के विशवास का खंडन कैसे कर दूँ. ऐसे बड़े लोग राजनीति में न अब है और न ही होंगे.

राज्यसभा में जनेश्वर जी मेरे नेता रहे, बीमारी के कारण सदन में बिल्कुल से नहीं आ पाते थे परन्तु महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने से बिल्कुल नहीं चूकते थे.   बहुत ही सहजता पूर्वक वह अपने विरोधियों को अपनी मारक क्षमता दिखलाते थे. वह शब्दों के प्रयोग में व्यंजना में माहिर थे. वह जब भी बोलते थे, मै उनके भाषण का श्रवण करने को उपस्थित रहता था. पार्टी के संसदीय बोर्ड के सदस्य के  रूप में मेरी अंतिम बैठक में अंगरेजी और कम्पूटर के मुद्दे पर मेरी उनसे बहस हो गयी थी, मैने इसका बुरा भी माना. पर जब मै गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए सिंगापूर जा रहा था तो यकायक उनका फोन आया और कहने लगे, प्यारे गुस्सा क्यूँ हो गए, मेरी बहस का बुरा मत बनाओ. वह बोले, तुम बिल्कुल मत घबराना, इच्छा शक्ति रखना , मै कह रहा हूँ, जीवित लौट कर आओगे. अंतिम मुलाक़ात में उन्होंने दो बाते कही थी, समाजवादी बनो और सेहत का ख्याल रखो, इतनी गंभीर बीमारी के बाद न तो कोई इतना भागता है और न ही इतने तनाव में रहता है. मै उनकी दोनों सलाहों को आत्मसात कर चुका हूँ, सेहत को प्राथमिकता देते हुए दल के सभी पदों से इस्तीफा दे चुका हूँ और समाजवादी बनने के अभियान में श्री रघु ठाकुर, श्री मधुकर दीघे, श्री शत रूद्र जी से संपर्क साध चूका हूँ और श्री रवि रे जी और जार्ज जी से जल्दी ही मिलूंगा. रूद्र जी के अलावा यह सभी अपने जीवन की अंतिम संध्या में है. मेरे पिता की मृत्यु पर दिल्ली में हुई शोकसभा में सलाइन की बोतल लिए हुए जार्ज साहब का आना मुझे अभी तक नही भूला है. इसीलिये छोटे-मोटे समाजवादी साथियो की तुल्क टिप्पड़ियां मुझे आहत तो करती है पर तोड़ती नहीं है.

अब मै न तो दल का नेता हूँ और न ही सहयोगी, बकौल भाई रामगोपाल जी की समाजवादी पार्टी के लाखों-करोड़ों अदना कार्यकर्ताओं में एक हूँ. मुझे इस बात का संतोष है कि यह अदना कार्यकर्ता, सभी बड़े नेताओ से पहले अपने नेता को अंतिम श्रद्धांजली देने पहुंचा पाया. मेरे साथ सांसद जया जी, आर.के. पटेल पूर्व सांसद अखिलेश जी और विधायक मदन चौहान जी भी बहुत संतुष्ट दिख रहे है. बहुत कम लोगों को पता है कि पिछले लोकसभा चुनावो में अंतिम समय तक जनेश्वर जी ने अमरमणि त्रिपाठी के परिवार की तुलना में कुंवर अखिलेश सिंह जी को महाराजगंज चुनाव लडवाना चाहते थे. यह बात अलग है कि उनकी एक न चली थी.   

२७ जनवरी को मेरा जन्म दिन है, जनेश्वर जी के निधन की वजह से मै इस बार अपना जन्म दिन नहीं मनाऊंगा. मेरे सम्मान में मेरे जो समर्थक इस अवसर पर समारोहों का आयोजन करते है उनसे मेरा अनुरोध है कि कृपया मेरी भावनाओ का सम्मान करते हुए इस बार कोई आयोजन न करे. समाजवाद के इस पुरोद्धा, जिन्हें लोग छोटे लोहिया के नाम से जानते थे, उनकी स्मृति को मेरा सत-सत नमन और प्रणाम.

 

“जाने वाले कभी नहीं आते, जाने वालों की याद आती है”

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