ब्रिटिश भारत में हुए १९४३ के आकाल ने ४० लाख से भी अधिक लोगों की जान ली थी. इस आकाल के वर्षों बाद तक सारा देश इसे नहीं भुला पाया था. परन्तु १९६७ और १९७८ के बीच हुयी “हरित क्रांति” ने हमारे देश की खद्यानों की समस्या को लगभग ख़त्म कर दिया था और धीरे-धीरे हमारे यहाँ सर्पलस अनाज पैदा होने लगा. लगातार बढ़ती जनसंख्या के बावजूद, हमारे अनाज के गोदाम वर्षो तक भरे रहे और हम भारी मात्रा में अनाज का निर्यात भी करते रहे. परन्तु पिछले कई वर्षों में हमने अनुभव किया है कि हमारे किसानो की उत्पादन क्षमता में ठहराव सा आ गया है. जिस तरह से जलवायु परिवर्तन और रितुवों का मिजाज़ मनमाना हो रहा है, शायद फसलों का उत्पादन बढ़ने की जगह घटने लगे. जनसँख्या वृद्धि की दर तो कम हो सकती है परन्तु शायद आने वाले ५० वर्षो में भी हम जनसंख्या वृद्धि को स्थिर न कर पाए. इन सभी कारणों की वजह से आने वाले वर्षों में “फ़ूड ग्रेन” की स्थित काफी भयावी सी दिखती है और भगवान न करे की फिर कभी दोबारा १९४३ के आकाल जैसी स्थित का सामना हमें करना पड़े.

हमें पता है कि उपजाऊ बीज, बेहतर खाद और कीटाणु नाशकों के इस्तेमाल इत्यादि की वजह से हरित क्रांति संभव हो पायी थी परन्तु जलवायु परिवर्तन की वजह से शायद अब इन सबका इस्तेमाल करके उत्पादन और अधिक ना बढ़ाया जा सके. साथ ही साथ हमें यह भी ध्यान रखना है कि अधिक रसायनों का उपयोग न सिर्फ मानवीय स्वाथ्य के लिए ख़राब है बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव प्रकति पर भी पड़ते है. इसलिए आने वाली पीढ़ियों का पेट भरने के लिए अब हमारे सामने “जेनेटिक इंजीनिअरिंग” के अलावा और कोई साधन नहीं है. हमारे देश ही नहीं सारी दुनिया में आज जेनेटिक इंजीनिअरिंग के द्वारा उत्पादन बढाने के अथक प्रयास चल रहे है.

इस बात में दो राय नहीं कि अब हमें जेनेटिक इंजीनिअरिंग को बढ़ावा देने की सख्त जरूरत है परन्तु किसी भी विज्ञान और तकनीक के कुछ नुकसान भी होते है. जैसे की जेनेटिकली मोडीफाइड फ़ूड का खाने वाले के स्वास्थ पर गलत असर पड़ सकता है, मिट्टी की गुणवत्ता हमेशा के लिए खराब हो सकती है. परन्तु भारत जैसे गरीब कृषि प्रधान देश में इसका बहुत ही खराब असर किसानो की स्वात्यता पर पड़ सकता है. यह तो सब को पता है कि जेनेटिक इंजीनिअरिंग एक बहुत ही महंगी विधा है, इसलिए इस विज्ञान के द्वारा शोधित बीज की कीमत बहुत ही अधिक महंगी होगी और काफी हद तक संभव है की इसमे निजी कंपनियों की भी भागेदारी होगी. एक बार अगर किसान इस तरह के बीज का इस्तेमाल करना शुरू करता है तो वह बीज के लिए पूरी तरह से निजी कंपनियों पर आश्रित हो जाएगा और संभव है किसानो को शोषण का भी सामना करना पड़े. इन सभी कारणों की वजह से सरकारों को इस विषय को काफी गंभीरता से लेने की जरूरत है जिससे के इस विज्ञान का उपयोग मानवता के हित में हो जाये परन्तु इसके नकारात्मक प्रभावों को भी दूर किया जा सके.

पिछले कुछ दिनों में बी.टी. बैगन का मामला काफी गर्म रहा है. बी.टी. बैगन के अडोप्शन के खिलाफ और इसके पक्ष में अलग-अलग तरह के तर्क रखे गए है. हमारे पर्यावरण मंत्री को इस मसले को ले कर काफी मशक्कत करनी पडी और कई बार प्रो-फारमर लाबी के तीरों का शिकार भी होना पडा. हाल में ही मंत्री महोदय ने बी.टी. बैगन को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया. मै उनके इस निर्णय का स्वागत करता हूँ परन्तु साथ ही साथ उनको सुझाव भी देना चाहता हूँ की शायद अब हम जेनेटिकली रूपांतरित किस्मों को ज्यादा दिनों तक नजर अंदाज नहीं कर पाए. अतः आने वाले समय में हमारे किसान भाइयों के हित और उपभोक्ता के स्वास्थ्य को ध्यान में रख कर जेनेटिक इंजीनिअरिंग को बढ़ावा दिया जाय.

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