स्वतंत्रता के बाद हमारे संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को आरक्षण दे कर उनकी दरिद्रता को दूर करने का जो प्रयास किया गया समय के साथ उसके परिणाम आए और आज कभी दलित कहे जाने वाला वर्ग आर्थिक और सामाजिक रूप से तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है जिसका जीता-जगता उदाहरण उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी है. वैसे इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि दलितों को दिए गए आरक्षण का लाभ सम्पूर्ण दलित समाज को न मिल कर दलितों के एक वर्ग विशेष को मिला. दलितों का यह विशेष वर्ग तेजी से आगे बढ़ रहा वही बांकी के दलित भाई जिनको वास्तव में विकास के लिए आरक्षण और दूसरी सहायता की जरूरत है और पीछे छूटते जा रहे है.

कुछ ऐसा ही हाल हमारे अतिपिछड़े भाइयों का भी हो रहा है. अतिपिछड़ी जातियां जैसे कि कश्यप, निषाद, बघेल, लुहार, बढ़ई, भड़भूजे, तेली, तमोली, नई, राजभर, नट इत्यादी सदियों से अपने पारंपरिक काम-काज से अपना जीवन व्यापन करते आ रहे थे परन्तु औद्योगीकरण और व्यवसायीकरण के कारण धीरे वह अपना पारंपरिक व्यवसाय खोते चले गए. इन जातियों के पास जमीन का मालिकाना हक भी ना के बराबर है इसलिए पुश्तैनी धंधे खो देने की वजह से यह वर्ग बेरोजगारी की वजह से भुखमरी की कगार पर है. १९९० के दशक में “मंडल कमीशन” आने से पिछडों को आरक्षण मिला. मंडल कमीशन के पीछे की सोच शायद इन अतिपिछड़ों का विकास ही रहा होगा परन्तु दलित आरक्षण की तरह पिछडों के आरक्षण का लाभ भी कुछ एक-दो जातियां जो पहले से ही ज्यादा पढ़ी लिखी और संपन्न थी ले गई. यह संपन्न पिछड़े लोग कौन है, शायद बतना जरूरी नहीं है.

इसलिए अतिपिछड़ों का विकास दलितों की तर्ज पर आरक्षण के बिना नहीं हो सकता है. यह बात मेरे दिमाग में बहुत पहले से थी और यह बात मैने अपनी पुरानी पार्टी के अगुआ से बार-बार कही थी परन्तु शायद उनकी सोंच में पिछड़े का मतलब सिर्फ एक जाति से है. परन्तु लगातार बोलने और कहने के बाद श्री मुलायम सिंह जी ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में कश्यप, निषाद, राजभर, प्रजापति, नट, नोनिया (चौहान) इत्यादी जातियों को अनु-सूचित जातियों की तर्ज पर आरक्षण देने के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजा परन्तु सपा सरकार केंद्र सरकार पर इस प्रस्ताव को पारित करने का पर्याप्त दबाव नहीं बना पाई. २००७ के विधान सभा चुनावो के दौरान सुश्री मायावती जी ने मुलायम सिंह जी पर इल्जाम लगाया था कि प्रस्ताव को सपा सरकार ने ठीक से नहीं बनाया था इस लिए वह पास नहीं हुआ और अगर वह सत्ता में आई तो इन जातियों को लाभ देंगी. परन्तु सत्ता में आने के बाद ६ जून २००७ को मायावती जी ने पिछली सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव को केंद्र से पास कराने के बजाय इस प्रस्ताव को ही खारिज कर दिया. पिछडों के आरक्षण का लाभ लेने वाले वर्ग के नेता और दलितों के आरक्षण का लाभ लेने वर्ग की नेत्री की आपस की लड़ाई में मारा गया बेचारा अतिपिछड़ा. चाहे वह सपा हो या बसपा या फिर केंद्र में सत्तारूढ़ दल किसी ने भी अति-पिछडों के दर्द को समझने का प्रयत्न नहीं किया है. सब के सब ने इनकी लाचारी, बेहाली और गरीबी का मजाक उड़ाते हुए अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकी है.

अति-पिछड़ी जातियां की संख्या उत्तर प्रदेश में २०% से भी अधिक है परन्तु अकेले कोई भे जाति २% ज्यादा नहीं है. इस बिखराव की वजह से अपने को गरीबों और पिछडों का मसीहा कहने वाले दलों ने इन छोटी जातियों का राजनैतिक दोहन तो किया परन्तु इन्हें इनका अधिकार कभी भी नहीं दिया. इसलिए आज इन सभी छोटी- छोटी जातियों को एकजुट हो कर २०% का समूह बन कर अपने आर्थिक, राजनैतिक अधिकारों की मांग करनी है. “बंद मुट्ठी लाख की खुल गई तो ख़ाक की”, हमें एकजुट हो कर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ानी है. आज मै अपने अति-पिछड़े नेता साथियों के साथ इस बात की घोषणा करता हूँ के मेरा और मेरे साथियो का अति-पिछडों को आराक्षण दिलाने की अनवरत प्रयास जारी रहेगा, हम सडको पर भी उतरेंगे और आंदोलन भी करेंगे.

समाजवादी पार्टी हो या बहुजन समाज पार्टी अतिपिछड़ों के लाभ की बात तो करती है लेकिन व्यव्हारिक रूप बात से आगे उनकी बात नहीं बढ़ पाई. दोनों दलों के नेता अपने-अपने समुदायों के लोगो के हितैषी ही रह गए और अति पिछडा वर्ग आज भी यही सवाल कर रहा है.

“मै उनकी राह देखता हूँ रात भर, वो रोशनी दिखाने वाले कहाँ गए”

Bookmark and Share