मेरे ब्लॉगर साथियों मैने कहा था कि अपनी पुरानी पार्टी का नाम नहीं लूँगा. उत्तर प्रदेश बड़ा प्रदेश है और यहाँ की राजनीति और दल देश को प्रभावित करते है. आज बात व्यक्ति की नहीं मुद्दे की हो रही है. अपने साथियों को मेरी पुरानी पार्टी के नए प्रवक्ता बेशरम, कमीना, नुमायशी चीज कहें तो यह समाजी सवाल नहीं है, एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को दी गई गाली मात्र है. परन्तु डोमरियागंज के नतीजे के बाद इन महोदय का बयान है कि छोटी पार्टियाँ बेकार और “वोट-कटवा” है. इसलिए जनता को पीस पार्टी जैसी पार्टी से दूर रहना चाहिए. सुबह, दोपहर, शाम, रात गैर-कांग्रेसवाद का रट्टा लगाने वाला आपका दल ललचाई निगाहों से ममता की विदाई की राह देख रहा है, बिना मांगे राज्यसभा में कांग्रेस को समर्थन देकर २०१२ में “हम साथ-साथ रहे” का आव्हान कर रहा है. अगर पीस पार्टी “वोट-कटवा” है तो आप कौन है? पार्टी नंबर फोर! आपके माध्यम से जनता अपना कांग्रेसीकरण क्यों करे? आप आज की राजनीति की पैसेंजर ट्रेन है जो हर स्टेशन और पड़ाव पर रुक-रुक कर मंजिल पर पहुंचेगी. अरे जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में “राहुल मेल” आ पहुँची है. प्लेटफार्म पर टिकटार्थी यात्रियों की भारी धक्कामुक्की है जिसमे पहले सिनेमा वालों को नाचईया कह कर चिढाने वाले फिर उन्ही का जूठन खाने वाले आपसे महापुरुष भी लाइन में हाँथ जोड़े विनम्रता से सत्ता की इस “राहुल मेल” में अपनी बर्थ तलाश रहे है, तो फिर आप पार्टी नंबर चार बिना वजह मैदान में क्यों है? बसपा, सपा और कांग्रेस के उपलब्ध नेतृत्व में राहुल का आकर्षण मुझे वैसे ही ज्यादा दीखता है जैसे कि फिरोजाबाद चुनाव के बाद यादव कुलवधू डिम्पल से ज्यादा राजबब्बर जी आपको ज्यादा आकर्षक दिखते थे. छोटी पार्टी ही सही, अपने दम पर है और डॉ अयूब पढ़े लिखे सर्जन है, उनका मजाक मत उड़ाइए. अपनी सड़ी गली सियासी हालत हैसियत पहचानिए. चलते-चलते आपके बताए पुराने बेशरम साथी की एक नेक सलाह:

“तिनका कबहू ना निंदिये, जो पायन तल होए,
कबहु उडिन आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होए.”

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