पूणे की जर्मन बेकरी में धमाका हुआ. कोई सुराग नहीं की यह किसकी हरकत है लेकिन पकड़ा कोई मुसलमान ही जाएगा. हो सकता है की वह मुसलमान भी हमारी बच्ची इशरत जहान की तरह मासूम हो लेकिन अपने मुसलमान होने की अच्छी-खासी कीमत उसे भी चुकानी पड़े. हमारे सेकुलर सियासतदा साक्षी महराज, कल्याण सिंह जी, शकर सिंह वाघेला, नारायण राणे, संजय निरुपम सबको सियासती दूध के घोल में सेकुलरिज्म का पानी बना कर मिला देते है और अगर इस तरह के सियासतदाओं की जानिब मै कहता हूँ की यह हरी घास में छुपे बैठे जहरीले न दिखाई देने वाले हरे आस्तीन के सांप है तो मेरे इस बयान को किसी एक सियासी शख्स से जोड़ दिया जाता है. बटला हाउस काण्ड के दो साल बाद कांग्रेस के एक मेहरबान नेता आज़मगढ़ जाने की पेशकश करतें है. सरकार आपकी सरकार है, आप दो सालों तक सो क्यूँ रहे थे और दो सालों बाद यकायक जागे है. मेरे भाई रावण का भाई कुम्भकरण भी सिर्फ छः महीने ही सोता था, आप तो कुम्भकरण को भी पीछे छोड़ दिए है.

शेहीद हेमंत करकरे ने मुंबई के आतंकी कसब को भी पकड़ा, वहीं मालेगांव की आतंकी साध्वी प्रज्ञा को भी कानूनी घेरे में लिया. आतंकवाद इस्लाम का वाहिद चेहरा नहीं है. डॉ. कलाम, हवालदार अब्दुल हमीद, डॉ. जाकिर हुसैन, मौलाना आज़ाद, डॉ. फखरुद्दीन अली अहमद, श्री हामिद अंसारी भी तो मुसलमान है. मुसलमान की हिंदुस्तानियत पर शक मुल्क की बहदूदी और तरक्की के खिलाफ है. कुछ कट्टर हिन्दू भाई इल्जाम लगा सकते है कि मै मुस्लिम तुष्टीकरण की बात कह रहा हूँ, दुनिया में सबसे अधिक तादात में मुसलमान मलेशिया में है. हिन्दुस्तानी मुसलमान हिन्दुस्तान में अल्पसंख्यक होने के बावजूद संख्या में मलेशिया से अधिक है और कहीं यह बिदक गया तो ज्यादा नुकसान हिन्दू भाइयों का ही होगा. जरूरत हमवारी की है. हमी हम है तो क्या हम है, तुम्ही तुम हो तो क्या तुम हो, मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा. ‘ह’ से हिन्दू और ‘म’ से मुसलमान, इस सुर के बिना हिन्दुस्तान में खुशहाली का सरगम नहीं बज सकता है, बाबरी मस्जिद के भड़काऊ तकरीर से अधिक तालीम और रोजगार की जरूरत है, शायद इसीलिये और दूसरी मुस्लिम तंजीमों के मुकाबले मुसलमानों ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में डॉ अयूब की पीस पार्टी को मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी से कहीं कहीं ज्यादा तबज्जो दी. आतंकवाद का एक चेहरा दहशतगर्दी है, तो दूसरा चेहरा वो सभी सियासतदा है जो दहशतगर्दी के लिए मुसलमानों को मजबूर करतें है. मुस्लिमों के मुफीद के लिए दवा, तालीम, रोजगार के अवसर जब तक आम मुसलमानों की बजाय अफसरशाहों और मौक़ा परस्त नेताओं की जेब तक सीमित रहेंगे, आतंकवाद अपने कई चेहरों के साथ कभी इस्लाम के नाम पर कभी नक्सलवाद के नाम पर मुल्क में बदहाली करता रहेगा. इससे अगर बचना है तो सियासत के दोमुहे सापों के हर रोज़ बदलते चेहरों को पढ़ने की लियाकत होनी चाहिए. आखिर क्या कहूँ,

“जब भी जी चाहे नए चहरे लगा लेते है लोग, एक चहरे पर कई चहरे लगा लेते है लोग.”

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