“यूनियन कारबाइड” विभीषिका पर काफी टिप्पणी चल रही है. घटना मध्य प्रदेश की है. पुलिस केस भी वहीं का है. भोपाल के तत्कालीन जिलाधीश श्री मोती सिंह और तत्कालीन नागरिक उड्डयन विभाग के प्रभारी श्री आर.सी. सोंधी का बयान भी तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अर्जुन सिंह जी की तरफ उंगली उठा रहा है. ऐसे में अमरीकी दबाव पर तब की केंद्र सरकार पर आरोप लगाना, अटकलों के बाजार को सरेआम गर्मी देने की तरह है. इस अमानवीय दुर्घटना के लिए सरकारी प्रणाली जिसे समय समय पर गैस लीकेज की खबर मिलती रही है, के साथ-साथ देश की न्यायिक प्रक्रिया को भी दोषी ठहराना उचित होगा. दंड उतना हो जिससे दंडी अच्छी तरह चेत जाएँ एवं दंडी को दंड यदि देर से मिले तो यह भी बड़ा अपराध है.

इस त्रासदी से सबक लेने की जरूरत है ताकि इसकी पुनरावृत्ति ना हो. यह त्रासदी किसी भी पार्टी की सरकार की शासनावधि में हो सकती थी. हमें अमरीका को कोसने की खासी आदत है. दैवी आपदा एवं मानव जीवन हानि के ऐसे अवसरों पर अमरीका में राजनीति नहीं होती बल्कि डेमोक्रेट और कंजर्वेटिव, वर्त्तमान और भूतपूर्व राष्ट्रपति मिल कर आपस में सलाह से, राय से, आम सहमति के आधार पर काम-काज करते है. हमारे भारत महान के महान राजनेता दंगों, दुर्घटनाओं, सरहदी आक्रमणों से ले कर आतंकी हमलों तक को अपनी राजनीति के एजेंडे पर रखतें है. लोकशाही में पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों पाए अपरिहार्य है. लोकशाही की अपरिहार्यता के इस समन्वय को कम से कम हम विषम और विकट परिस्थिति में तो बनाए रखे. कुछ ना भी हो पाए तो भी कम से कम सत्ताधारी दल के नेता ही अपने दल के अतीत को धुंधला ना करे. सियासत की छोटी सी मर्यादा का पालन स्वस्थ राजनीति की जरूरत है. अपनो की चोट पड़ने पर कभी-कभी ऐसा लगता है,

“हर कदम पर रहा ये अंदेशा, पीछे कातिल है या मेरा साया”

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