कल से नितिन गडकरी जी के इस बयान की बड़ी ज्यादा चर्चा है कि चारा घोटाले और आय से अधिक संपत्ति घोटाले ने श्री लालू यादव जी और मुलायम सिंह यादव जी को ऐसा कुत्ता बना दिया है जो अपनी जान बचाने के लिए शासक दल के पाँव के तलवे चाटने वाले कुत्ते बन गए है. इस बयान पर मचे तूफ़ान के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का खेद प्रकट कर देना मामले का अंत कर देने के लिए काफी था. समाजवादी पार्टी आजकल मुद्दा विहीन है, इस लिए चर्चा में बने रहने के लिए पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने गडकरी जी के सार्वजनिक खेद प्रकट करने की बाद भी उन्हें भी कुत्ता कह डाला. अब प्रश्न उठता है कि आप में और गडकरी में क्या स्तरीय अंतर रहा?

मै श्री अरुण जेटली और भाई सुरेन्द्र सिंह आहलुवालिया की विनम्रता के आगे नतमस्तक हूँ, लिब्राहन आयोग की बहस के बाद के विवाद में मेरी और आहलुवालिया जी की झड़प हो गई थी, मेरे द्वारा खेद प्रकट करने के बाद जेटली जी और आहलुवालिया जी ने मामले को वही ख़त्म कर दिया था. यूं.पी.ए. के नुक्लिअर डील संक्रमण काल में मैने आदरणीय अडवानी जी के सन्दर्भ में कुछ ऐसा कह गया था जो बिल्कुल अनुचित था. बाद में मैने उनसे व्यक्तिगत खेद प्रकट किया और उन्होंने भी मुझे माफ़ कर दिया था. चूँकि अडवानी जी के प्रति मेरी टिपण्णी सार्वजनिक थी अतएव मैने अपने खेद का प्रकटीकरण भी सार्वजनिक रूप से श्री दीपक चौरसिया के एक कार्यक्रम में कर दिया था. पता नहीं हमारी पुरानी पार्टी की संस्कृति को क्या हो गया है? क्या यह लालू जी के नेतृत्व का प्रभाव है? जिस पार्टी के नेता मुलायम सिंह के भाई रामगोपाल मुझ जैसे पुराने साथी को पागल, कूड़ा, और उनके प्रवक्ता मोहन सिंह बेशर्म और कमीना दूरदर्शन पर सार्वजनिक रूप से कहते है एवं चुप्पी में फोन से माफी माँगते है और उस माफी का मेरे द्वारा सार्वजनिक जिक्र करने पर खुली गालिया छक कर सार्वजनिक रूप से टी.वी. पर देते है. ऐसे दल के नेता और उनके प्रवक्ता गडकरी जी की सार्वजनिक टिप्पणी पर किये गए उनके सार्वजनिक खेद को गरिमा से मान कर चुप बैठने के बजाए गडकरी जी को भी कुत्ता कह कर न जाने किस स्तरीय राजनीति को बढ़ावा दे रहे है. अपने शब्द बाण से उन्होंने मुझसा एक पुराना साथी सदैव के लिए खो दिया है और विरोधी ही सही एक राष्ट्रीय दल से वह भविष्य के अपने सम्पूर्ण संवाद के रिश्ते को भी ख़त्म कर रहे है.

मोहन ने कहा वह गडकरी पर केस करेगा तो मै भी कहता हूँ मुझे खुलेआम बेशर्म और कमीना कहने के लिए मै भी मोहन सिंह पर केस करूंगा. यह ओछापन है राजनीति नहीं. कुत्ता ना लालू जी, ना मुलायम जी, और ना ही गडकरी जी. यह एक संस्कृति है जो असभ्यता की पराकाष्ठा है आइये इसका नाम हम रखे “कुत्ता संस्कृति”, तो हमें इस बात का सही आंकलन बोलने वालों की जुबानों से ही हो जाएगा कि आखिर इस देश की राजनीति के विभिन्न दलों में ईमानदारी से इस “कुत्ता संस्कृति” की भाषा बोलने वाले सभी लोग ही सच्चे माएने में वो है जो वो एक दूसरे को यह बुलाते हुए थकते नहीं, और कुत्ते की तरह यह भी एक दूसरे के अस्तित्व को न पचा पाने के कारण लगातार भूंकते रहते है. मुझे इस बात का ज्ञान भली भाँती हो गया है कि इस देश की राजनीति में सचमुच :कुत्ता कौन” है. हम जैसे बेचारे तो यहे कहेंगे कि,

“अब तक जला रही है हमें तुहमतों की धुप, हम तो उजाड़ हो गए फस्ले वफ़ा के बाद”

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