आज सुबह-सुबह मेरी छोटी सी नन्ही सी बेटी दिशा ने पूछा “पापा दूसरे पापाओं की तरह आप हमारे साथ रहते औए खेलते क्यों नहीं है?” मै स्तब्ध रह गया और अपने बीते दिनों के आंकलन में लग गया. समाजवादी पार्टी के साथ बिताए चौदह वर्ष, वहाँ पर दल के अंदर और नेता की वजह से अदालत से ले राजनेताओं तक के विवाद, फूले हुए हाँथ-पाँव और काँपते हांथो से गुर्दाविहीन शरीर द्वारा भरी गर्मी में पार्टी का प्रचार, जया बच्चन जी के लिए “आफिस आफ प्राफिट” की लड़ाई, फोन टेपिंग के विरुद्ध देश से अदालत तक किया गया युद्ध और “प्राइवेसी ला” की निर्मती, परमाणु करार के लिए और यूपीए सरकार के संक्रमण काल में मायावती जी, अडवाणी जी और प्रकाश कारत जी के संयुक्त मिशन के सामने अपने ही खास दोस्त भाई राजदीप सरदेसाई का स्टिंग, कैश फार वोट के आरोप की संवेदनशीलता के अवसर पर व्याप्त राजनैतिक और सामाजिक अकेलापन.

पिछले दिनों अपनी मर्जी से एक विधायक मेरे समर्थन में आए, फिर उनपर कुछ साथियों ने आर्थिक अनियमितताओं का आरोप लगाया और उन्होंने अपने प्राणों का खतरा बताते हुए मुझसे किनाराकशी करते हुए बसपा का दामन थामा. मैने बुरा नहीं माना क्योंकि सचमुच उनकी जान को खतरा है. बसपा में शामिल यह विधायक महोदय पिछले दिनों जया बच्चन जी से उनके घर पर घंटों बतियाते रहे, अभिषेक और ऐश्वार्या से भी मिले. इसी मीटिंग में जया जी ने कहा कि लगता है अमर सिंह जी कांग्रेस में जा रहे है लेकिन मै जितना सोनिया को जानती हूँ वह उन्हें कांग्रेस में नहीं लेंगी. यह सूचना मिलने पर मै स्तब्ध रह गया. सोनिया जी से राजनैतिक विरोध तो शरद पवार जी का कांग्रेस के अंदर से शुरू हुआ और वह मंत्रिमंडल में है. जया जी की और मेरी भी कुलवधू सोनिया जी के नेतृत्व की सरकार द्वारा ही पदमश्री से अभी-अभी अलंकृत हुई है. जहा तक मेरा अपना प्रश्न है आदरणीया जया जी समाजवादी दल में है और मै कही भी रहूँ मुझे समाजवादी दल में नहीं रहना है. मुझे विचित्र यह बात लगी कि व्यक्तिगत और तल्ख़ लड़ाई “आफिस आफ प्राफिट” के दौरान ही मेरी कांग्रेस नेतृत्व से हुई. यह तो वही बात हुई कि “जाके लिए चोरी की वही कहे मोहे चोरा”. ख़ैर, यह मेरी भूल थी, दूसरों की लड़ाई का बोझ अपने कन्धों पर ढोने वाले कहार को भी दुल्हनिया कहाँ याद रखती है जो जया जी मुझे याद रखे. होम अगर करना हो तो अपने लिए करे, दूसरों के लिए होम करते अगर आपके हाँथ जले तो किसी का क्या दोष? अपने निकट के अनन्य स्वजनों का होम अब मै कभी ना करूँ पर जो हो चुका उस पर तो बस इतना ही कह सकता हूँ कि “कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन” ताकि मै अपनी नन्ही दिशा के बचपन को फिर से जी सकूं.

बड़े लोगों से रिश्ते की कीमत की अदायगी तो करनी ही होगी. बड़े आपको कालीन समझ आप पर चहलकदमी करें तो इसे भी आप अपना सौभाग्य समझे कि उनके चरण आप पर कम से कम गिरे तो. आप भी अगर वही करना चाहे जो वह आपसे करने के आदी है तो साहब आप औंधे गिरे पड़े मिलेंगे, यानी कि आप अमर सिंह हो जाएंगे. गुरबत के मारों को आप रोटी दोगे तो दुआ मिलेगी और भरे पेट वालों को पकवान भी दिया तो नमक और चीनी का हिसाब भी देना पडेगा. बीता दिन और अतीत तो नहीं लौटता लेकिन उसके खट्टे मीठे अनुभव से आने वाले कल का मुस्तकबिल और तकदीर जरूर संवारी जा सकती है. हाँ, छोटों में भावनाओं का अहसासे दर्द और बड़ों में इस अहसासे दर्द की मौत की दस्तक होती है. मै तो इतना ही कहूँगा,

हमें इस जिंदगी पर इसलिए भी शर्म आती है, कि हम मरते हुए लोगों को तन्हा छोड़ आए है.”

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