कलकत्ता मेरा पुराना शहर है, आज भी मेरा वहाँ घर है और मै अपना आयकर भी वहीं चुकाता हूँ. कल कुछ अपरिहार्य कारणों से मेरा कलकत्ता जाना हुआ. कार्यक्रम के पूर्व मुझे मेरे कार्यालय में श्री बसंत कुमार बिरला एवं श्रीमती सरला बिरला के ७०वें वैवाहिक जीवन की वर्षगांठ के उत्सव का निमंत्रण दिखा. बसंत कुमार जी एवं सरला जी से मेरी खास घनिष्ठता कभी नहीं रही परन्तु बिरला परिवार के एक दूसरे सदस्य स्वर्गीय श्री कृष्ण कुमार बिरला जी का मुझ पर बहुत स्नेह रहा. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मेरे प्रिय नायक श्री देव आनंद जी थे. कोलकता में था ही और इसलिए मैं कार्यक्रम में पहुँच गया. बसंत कुमार जी की पुत्री मंजुश्री जिन्हें घर में लोग प्यार से मैंगो कहते है, बड़े प्यार से मिलीं और मुझे अपने माता-पिता और देव साहब के साथ प्रथम पंक्ति में बिठाया. ऐसा लगा ही नहीं कि सरला जी एवं बसंत बाबू मेरे अंतरंग नहीं. कार्यक्रम में स्वर्गीय आदित्य बिरला जी की पुत्री वासवदत्ता का एक नया रूप एक अनूठी गायिका का रूप में दिखा. उनके पति एवं मेरे बड़े ही स्नेहभाजन कुशाग्र बजाज की अनुपस्थिति और साथ-साथ इस अवसर पर पौत्र श्री कुमार मंगलम बिरला की अनुपस्थिति भी बहुत खली.

कलकत्ता के कई बीते दिनों के साथी इकट्ठे मिले और भाव विभोर दिखे. बीता हुआ कल और उसके खट्टे-मीठे अनुभवों की जड़ पर खडा मेरा वर्तमान और वर्त्तमान की अनुभूति के सम्बल से संबद्ध भविष्य का आंकलन कार्यक्रम के पूरे परिदृश्य में एक बात बार-बार संप्रेषित कर रहा था कि जीवन में सफलता के कई पिता और विफलता को वर्णशंकर मानकर परित्याग कर छोड़ कर आगे चलना ही जीवन की व्यवहारिक प्रासंगिकता है.

कुछ ऐतिहासिक सत्य कि जमनालाल बजाज जी की पहल पर महात्मा गाँधी कि पत्नी बा के नारियल और तत्कालीन स्वाधीनता संग्राम के पुरोद्धा और भारत को एकीकृत गणराज्य बनाने वाले लौह पुरुष सरदार पटेल भी इस दम्पत्ति के वैवाहिक सूत्र बंधन के चश्मदीद गवाह रहे. बिरला परिवार की शिक्षा के प्रति संकल्पता एवं वैवाहिक कार्यक्रमों में भडकाऊ प्रदर्शन की अपेक्षा सादगी गांधीवाद से प्रभावित है. जिस बजाज परिवार ने कन्यादान बिरला परिवार को दिया उसी कन्या श्रीमती सरला बिरला की पौत्री वासवदत्ता जमनालाल बजाज जी के प्रपौत्र की धर्मपत्नी बनी अर्थात कालचक्र पूरा घूमा. मैने सुना था “गुजरा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा” पर यहाँ तो देख रहा हूँ कि “काल का पहिया घूमे रे भैया लाख जतन इन्सान करे, क्योंकि ७० वर्ष पूर्व बजाज ने बिरला परिवार को वैवाहिक सूत्र में बांधा और कई दशकों बाद इसी वृक्ष की उत्पत्ति और संतति बजाज परिवार की कुलवधू बनी. वासवदत्ता बहुत ही प्यारी, सुशील, पतिपरायण एवं संस्कारी गुणवंती कन्या है. काश मेरी पुत्रियां भी वासदात्ता की भाँति ही विनयशील बने.

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