आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग लिख रहा हूँ. पिछले कुछ दिनों से अपने डाक्टरों की सलाह पर विश्राम के लिये विदेश में हूँ. साथ में सिर्फ मेरी पुत्रियाँ दृष्टि और दिशा और पत्नी पंकजा है. बिना अपने मित्रों के शुद्ध परिवार के साथ यह मेरी प्रथम विदेश यात्रा है. इस यात्रा का पहला लाभ तो यह हुआ कि मैने अपनी ही बेटियों को अच्छी तरह पहली बार नजदीक से जाना और पहचाना. दृष्टि मेरी तरह जिद्दी और संवेदनशील और दिशा मेरी पत्नी पंकजा की तरह सहनशील है. मेरी दोनों बेटियाँ कब नौ साल की हो गई मुझे पता नहीं चला.

मै इस समय टर्की के अन्तालिया नाम के शहर में हूँ. टर्की मुस्लिम बाहुल्य देश है. समृद्धि और शिक्षा के समन्वय से जीवन के रहन-सहन और सोच में कितना गुणात्मक अंतर आता है, यहाँ के मुस्लिम भाइयों के रहन-सहन को देख कर समझ में आता है. तकनीकी रूप से टर्की यूरोप में है और इस्ताम्बुल के समुद्री पुल के आर-पार यूरोप और एशिया दोनों दिखते है. मै यहाँ राजनीति से दूर हूँ. पता चला मेरे भूतपूर्व साथी अबु अजमी ने मेरी पुरानी पार्टी के दरवाजे मेरे लिए खोलने का बयान दिया है, मजबूरन मुझे खंडन करना पडा. उधर पार्टी प्रवक्ता मोहन सिंह ने बयान दिया कि ऐसा कोई प्रस्ताव पार्टी का है ही नहीं. शुक्रिया मोहन, ईश्वर तुम्हारी तबियत जल्दी ठीक करे, सुना है तबियत काफी खस्ता हाल है.

भाई यशवंत सिन्हा जी जहाज में पिछले दिनों मिले थे, उनसे दिग्विजय सिंह जी (सांसद-बिहार) की ख़राब तबियत का हाल पता चला था. यशवंत भाई, दिग्विजय भाई और शत्रु भाई की तिकड़ी थी. तीन एकजुट हो कर शाम को काफी अच्छी महफ़िल जमाते थे. अमूमन लोगबाग धूप के साथी होते है और छावं में भाग खड़े होते है. हाल के मेरे अपने जीवन का अनुभव यही रहा है. बड़े-बड़े लोग जो साथ थे, कहाँ भाग गए, पता नहीं चला. दिग्विजय भाई की मिट्टी ही दूसरी थी. चंद्रशेखर जी, भैरों सिंह जी, जार्ज फर्नांडिस साहब, इन सब को हर मौसम में उन्होंने अपने दिल के करीब रखा. जद (यू) में नीतीश जी और शरद यादव जी के बढे वर्चस्व के बाद बूढ़े, बीमार, और लाचार जार्ज साहब को जब बड़े-बड़े लोग अकेला छोड़ गए तो भी दिग्विजय भाई उनके साथ लगे रहे. उपराष्ट्रपति पद से हटने के बाद भी यदि कोई भैरों सिंह जी के साथ लगा रहा तो वह भाई दिग्विजय सिंह ही थे. मरते दम तक यदि किसी ने स्वर्गीय चंद्रशेखर जी की स्मृति संजोय रखा तो वह भी दिग्विजय भाई ही थे. सुख-दुःख, आपद-विपद, अच्छे-बुरे समय की परवाह ना करके रिश्तों की निरंतरता और स्थाईत्व का रख रखाव करने के पारंगत जीवंत व्यक्तित्व के स्वामी थे दिग्विजय भाई. मुझे मेरी बीमारी में बहुत भावनात्मक सहारा देते थे वह. लगता नहीं कि वह हमें छोड़ कर गुजरा हुआ कल हो गए. ईश्वर उन्हें और उनकी आत्मा को शान्ति दे और भाभी को उनके बिना रहने की ताकत. उनकी स्मृति को नमन और प्रणाम करते हुए बड़े दुःख, वेदना और संवेदना के साथ जीवन के कटु यथार्थ को स्वीकारते हुए यही कहूंगा कि,

“गुजरा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा”

खुदा हाफिज़ मेरे दोस्त, जहा रहो खुश रहो, अल्लाह तुम्हे जन्नत नवाजे.

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