बनारस और गोरखपुर पिछले दो दिनों में बड़ा ही अनूठा रहा . बनारस में अति पिछड़ों का सम्मलेन, कुशवाहा भाइयों के साथ रात्रि भोज और प्रातः बाबा विश्वनाथ की विधिवत पूजा के बाद सड़क के रास्ते बनारस-गोरखपुर यात्रा अदभुत रही. कल तक मुझको छूने की होड़ में धक्का-मुक्की करने वाले समाजवादी पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं की भीड़ गुम थी. नवजवानों की नयी टोलियाँ, बूढों की तरसती आंखे और कौतुहल से मेरी ओर देखती माएं और बहनों के स्नेहसिक्त परिवार के प्रेम ने दलीय समर्थकों की नदारत टोली की कमी को पूरा कर डाला और मेरा त्यागपत्र और उसकी स्वीकृति कितनी सामयिक है, इस तथ्य का बोध भी मुझे भली-भांति हो गया.
२५ जून १९७५ को चंद्रशेखर जी ने लोकनायक जयप्रकाश के लिए दिल्ली में अपने साऊथ एवेन्यू स्थित घर पर चाय का आयोजन किया, जिसमे काफी सांसद और मंत्री आये थे. एकाध दिन में इसी चाय पार्टी से उद्देलित हो कर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी और चंद्रशेखर जी की गेस्ट लिस्ट के तमाम साथियों में मात्र रामधन, कृष्णकांत और मोहन धारिया रह गए. कुछ जगजीवन राम जैसे लोग चुप रह कर फटने की प्रतीक्षा करते रहे. आज मेरे साथ खुल कर सगड़ी के विधायक सर्वेश आये. कई गुपचुप मिले कहने लगे हम आधुनिक युग के जगजीवन बाबू है, नाम न खोलिए, सही वक्त पर फटेंगे. मुझे लगता है कि प्रदेश की जनता अधीर है. परिवारवाद, जातिवाद और तानाशाही से बेजार है, चाहे वह किसी नेता की हो या फिर किसी दल की. बनारस की भीड़ और गोरखपुर में कड़कडाती सर्दी में विभिन्न दलों और मतों का समन्वय स्वान्तः सुखाय मुझ जैसे कनिष्ट व्यक्ति को तन्मयता एवं एकाग्रता के साथ श्रवण कर रहा है, यह मेरी उपलब्धि नहीं, बल्कि स्थापित दलों एवं उनके नेताओं से जनता की भारी निराशा का परिणाम है. सत्ता और कुर्सी के निराले खेल में उपयोगी और प्रासंगिक व्यक्ति महत्वपूर्ण और जो नहीं वह भूतपूर्व. मुझसे मेरे पिता कहते थे कि “जरदार मर्द नाहर चाहे घर रहे चाहे बाहर, बेजार मर्द बिल्ली चाहे घर रहे चाहे दिल्ली”.
आजकल माननीय कल्याण सिंह जी को मुझसे चस्पा करने की बड़ी कोशिश चल रही है. अरे भाई, दुल्हे से ही पूंछ लो कि समाजवादी पार्टी में उसे कौन लाया था. मै जब इलाज के लिए सिंगापुर में था तो आगरा अधिवेशन में आमंत्रित कर किसने कल्याण सिंह जी को लाल टोपी पहना कर उनके नाम का खुद जयजयकारा किया. मेरे दल के पश्चिम के तीन विधायक जान कर अनजान है, कहते है, कल्याण फैक्टर के जिम्मेदार अमर सिंह है. भाई, साजिश न करो, नेता से हुकुम करा दो यह इल्जाम भी सरे तस्लीम ख़म है. वैसे आजकल मेरा हाल कुछ यूँ है कि-
“जिल्लेइलाही मेरे खिलाफ,
मुंसिफ मेरे खिलाफ,
गवाह मेरे खिलाफ”

बाहर धुंध है पर मेरे जीवन की धुंध छट गयी है, मेरा इस्तीफ़ा जो मंजूर हो गया है.

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