भारत एक प्रजातान्त्रिक देश है जिसमे सभी तरह की राजनैतिक विचारधाराओ को फलने-फूलने के समान अवसर मिलते है. हमारे देश जैसा इन्द्रधनुसीय राजनैतिक पटल शायद ही दुनिया के किसी और देश का होगा. एक ओर केंद्र में सत्ताधारी दल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा लगभग एक दर्ज़न राज्यों में सत्ता में काबिज है दूसरी तरफ वाम पंथी दल 3 राज्यों और बाकी राज्यों में शक्तिशाली क्षेत्रीय दल सत्ता में है. कभी ”सेकुलरिस्म” और “कम्युनलिस्म” के नाम पर बंटी हमारी राष्ट्रिय राजनीति में वामपंथी दलों ने वर्षो से अपनी एक अलग पहचान बना कर रखी है. वैसे तो वामपंथी दल वर्षो से सक्रिय रहे है परन्तु अलग अलग पंथो में बटे रहने के कारण उनकी राजनैतिक प्रासंगिकता तब तक नहीं बन सकी जब तक कि वह सब एक साथ एक मंच में नहीं आ गए, इन अलग-अलग वाम पंथो को एक मंच में ला कर देश को एक शक्तिशाली राजनैतिक विकल्प देने में ज्योति बाबू की एक बहुत ही बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

आज ज्योति दा के निधन से हमारे देश की राजनीति में एक बहुत ही बड़ा शून्य पैदा हो गया है. वैसे तो उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास काफी समय पहले ले लिया था परन्तु फिर भी वह वाम दलों के कर्ता-धर्ताओं के लिए प्रेरणाश्रोत और मार्गदर्शक अभी भी थे. उनके राजनीति से संन्यास लेने के बावजूद समय-समय पर हम सुनते रहते थे कि न सिर्फ वाम दलों के नेता बल्कि बाकी पार्टियों के नेता भी उनसे विचार-विमर्श करने अक्सर जाते रहते थे, जो की उनकी राजनैतिक समझ और उनके प्रति लोगो के सम्मान का धोतक है. मुझे याद है कि १९९६ में जब तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने का उपक्रम चल रहा था और ज्योति बाबू का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय सा था, उनके दल और खुद उन्होंने इतना बड़ा पद ठुकरा दिया. स्वतंत्र भारत में इतने बड़े राजनैतिक बलिदान की दूसरी मिसाल सिर्फ सोनिया गाँधी है जब उन्होंने २००४ में प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया.

ज्योति दा ने अपनी विधि की शिक्षा लन्दन के मिडिल टेम्पल से पूरी की और वही से उनकी सोच को मार्क्सिस्ट  दिशा इंगलैंड के मार्क्सिस्ट नेताओ हैरी पोलिट, रजनी पाल्मे दत्त और बेन ब्राडले इत्यादि की सांगत में मिली. लन्दन से लौट कर वह बैरिस्टर बन के शान और ऐश्वर्य की जिन्दगी जी सकते थे परन्तु उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो कर ट्रेड यूनियन और दूसरी मजदूर संसथाओ से जुड़ कर संघर्ष का रास्ता चुना. १९५२ में पहली बार विधायक बनने के बाद १९९६ बात लगातार पश्चिम बंगाल की विधायिका के सदस्य रहे, १९५७ से १९६७ तक नेता प्रतिपक्ष, १९६७ से १९६९ तक उप-मुख्यमंत्री और १९७७ से २००० तक मुख्यमंत्री; इतना लम्बा और गौरवशाली राजनैतिक जीवन किसी और का नहीं रहा है. लगभग ५० सालो तक शक्तिशाली पदों में रहने के बावजूद ज्योति बाबू ने सादगी का रास्ता नहीं छोड़ा और वामपंथी मर्यादाओ का मरते दम तक पालन किया.

मेरा लालन-पालन और शिक्षा कोलकोता में हुई थी, बचपन में अपने चितरंजन एवेन्यू के फ्लैट में जब मुझे सायरन की आवाज सुनाई देती थी तो पता लगता की ज्योति दा का काफिला निकल रहा है और मै उनकी एक झलक पाने के लिए बहार भाग कर आता था. १९९६ में जब तीसरा मोर्चा बना तो ज्योति दा उसके चेयरमैन, नेताजी संयोजक, और मेरे साथ सीताराम यचूरी, देवे गोड़ा इत्यादी सदस्य बने. इस अवसर में मुझे ज्योति दा के साथ नजदीकी से काम करने के मौका मिला. मै मुलायम सिंह जी का धन्यवाद देना चाहूँगा की उनके सानिध्य में मुझे ज्योति दा जैसी बड़ी हस्ती के साथ काम करने का मौका मिला.

अभी कुछ दिन पहले अपनी एक पोस्ट “enemy or rival” में मैने उस युग का जिक्र किया था जिसमे राजनैतिक प्रतिद्वंदी को दुश्मन न समझ के सम्मान से देखा जाता था. इस कड़ी में मैने पं गोविन्द वल्लभ पन्त द्वारा वामनेता डांगे जी और श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा चरण सिंह जी और बुपेश गुप्ता के खिलाफ अपने सहयोगियों की सलाह के बावजूद कोई कार्यवाई न करने के बात कही थी. इसी कड़ी में मै ज्योति दा को भी जोड़ना चाहूँगा, उन्होंने समस्त जीवन अपने प्रतिद्वंदियों के साथ अच्छे सम्बन्ध रखे और उन्हें यथोचित सम्मान भी दिया. मुझे याद है ज्योति दा श्रीमती इंदिरा गाँधी को प्यार से इन्दू कह कर बुलाते थे और वह श्री फिरोज गाँधी के बहुत अच्छे मित्र भी थे. १९७७ में जब कांग्रेस बुरी तरह से पराजित हुई तो ज्योति दा ने मर्यादा का पालन करते हुए श्रीमती गाँधी को दार्जिलिंग में आराम करने के लिए निमंत्रित किया था और इंदिरा जी ने उनके इस आमंत्रण को स्वीकार भी किया था. आज जब राजनैतिक मर्यादा धरातल में चली गयी है, हम सब राजनैतिक लोगो को शपथ लेनी चाहिए कि हम ज्योति बाबू द्वारा स्थापित राजनैतिक मूल्यों को पालन करेंगे, शायद हमारी तरफ से उनके लिए यही सबसे बड़ी श्रद्धांजली होगी.

ऐसी महान हस्ती को मेरा सत-सत प्रणाम, भगवान् इस दिवंगत आत्मा को शांती प्रदान करे.

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