राजनीति रंडी है या चंडी, सती साध्वी रमणी नहीं, ऐसा माननीय चंद्रशेखर जी ने अपनी ‘जेल डायरी’ में राजनीति को परिभाषित करते हुए लिखा था. राजनीति में विरोध नीति का हो, विचारों का हो, खुलासा घोटालों का हो, यह तो सहने लायक बात है. लेकिन राजनीति में चरित्र हनन के कुत्सित प्रयास हों, इससे टुच्ची और गंदी बात नहीं हो सकती. मध्यप्रदेश के छिन्दवाड़ा में श्री जार्ज फर्नांडीज, श्री जनेश्वर मिश्र और श्री मुलायम सिंह यादव के पक्के चेले सुनीलम के एक पक्के चेले श्री किशोर समरिते है. समाजवादी पार्टी के दोनों पूर्व विधायक हैं और घुट्टी से धुर कांग्रेस विरोधी है. पिछले राज्यसभा चुनाव में मध्यप्रदेश से श्री दिग्विजय सिंह जी के निकटतम श्री विवेक तनखा को कांग्रेस ने अपने समर्थित उम्मीदवार के रूप में उतारा. श्री विवेक तनखा मेरे भी दोस्त है और आजकल देश के एडिशनल सोलिसिटर जनरल है. भाजपा उम्मीदवार के मुकाबले कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार को समर्थन देने का पार्टी का अधिकृत निर्णय हुआ और मुझे मध्यप्रदेश भेजा गया. श्री किशोर समरिते ने इस निर्णय के खिलाफ एक घटना प्रायोजित करके एक बवंडर मचा कर प्रेस कर डाली कि कांग्रेस, श्री तनखा और श्री सुरेश पचौरी मुझे रुपयों में खरीद रहे है. मैने तत्काल उनके खिलाफ कार्यावाही की लेकिन मेरे नेता ने उसे निरस्त करते हुए उन्हें बहाल कर दिया. अब तो समरिते मध्यप्रदेश से उत्तरप्रदेश आकर अपने समाजवादी नेताओं के सहयोग से श्री राहुल गांधी पर एक झूठा, गंदा, बेबुनियाद आरोप लगा रहे है जिसके विरुद्ध न्यायपालिका ने ५० लाख का जुर्माना उन्ही पर वापस ठोक दिया है.

कभी काला झंडा कभी काली गैस से भरे गुब्बारे और कभी काले इल्जाम और उसके बाद चाहिए सपा सुप्रीमो को यूं.पी.ए. की सत्ता का जाम. सपाइयों को पहले यह तय करना चाहिए कि वह चाहते क्या है? यदि वह धुर कांग्रेस विरोधी है तो सरकार बचाते समय मुझे रोकें टोकें क्यों नहीं? माया, कारथ और अडवानी के साथ शामिल हो जाते. सरकार बचाने का सारा श्रेय भी नहीं ले सकते क्योंकि उनके अपने दल के श्री बेनी प्रसाद वर्मा, श्री राज बब्बर एवं श्री एस.पी. सिंह बघेल के साथ कई सांसद पलायन कर चुके थे. साथ बच गए सांसदों की दवाई भी मुझे विशेष रूप से अपने नेता की उपस्थिति में ही करनी पडी. इसके बावजूद भी काफी और सांसदों की जरूरत थी. शीघ्र ही यदि २०१२ के पूर्व कोई ठोस विकल्प नहीं दिखा तो न्यूक्लियर डील की हिमायत के समय की दुराग्रहपूर्ण स्थिति आ सकती है और समाजवादी दल के पारिवारिक हाई कमांड एवं रेवती रमण सिंह सरीखे एकाध को छोड़ कर सभी सांसद सामूहिक रूप से आने वाले सियासी सूनामी से बचने के लिए बसपा, कांग्रेस या किसी भी दल के नीचे आशियाना ढूंढ सकते है. तर्क के बदले तर्क, कूटनीति का उत्तर कूटनीति और दाँव का जवाब दाँव यहाँ तक तो ठीक है लेकिन थके-हारे नेता विरोधियों का चरित्र हनन करें, यह टुच्चापन है. राजनीति के टुच्चापन पर मुझे मस्जिद बचाने की कमाई खा कर मस्जिद गिराने वालों से मोहब्बत करने वालों पर एक मिसरा याद आ रहा है जो उनकी सियासत के लिए काफी मुफीद है.

अगर हिजरत न की होती तो मस्जिद भी नहीं गिरती,
रवादारी की जड़ में हम ही मठ्ठा छोड़ आये है.

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