इंसानी रिश्ते बड़े अजीबोगरीब होते है. कभी-अभी वर्षों के साथी बिछड जाते है और असमान्य रूप से जिनसे कोई अपेक्षा नहीं होती, आकर जुड जाते है. नजदीकी रिश्तों में प्रविष्ट दूरियां काफी खतरनाक होती है क्यूंकि रिश्ते की यह दूरी सहज संवाद की प्रक्रिया को भी खत्म कर देती है. “इंदिरा जी भारत है और भारत इंदिरा जी”, का यह पर्यायवाची नारा देने वाले, श्री देवकांत बरुआ जब इंदिरा जी से दूर हुए तो क्या हुआ? शानदार व्यक्तित्व के स्वामी और किसी समय के मुम्बई के मजबूत कांग्रेसी नेता श्री रजनी पटेल जब इंदिरा जी से दूर हुए तो क्या हुआ? बाल्यावस्था से जे. पी. और प्रभावती जी को जानने-मानने वाली इंदिरा जी की जब उनसे दूरियां बढ़ी तो १९७७ में सम्पूर्ण क्रान्ति प्रतिफलित हो गई. दूरियां,

संवादहीनता और कटुता के साथ-साथ बिखराव भी लाती है. सदन में एक पुराने साथी से हुई आकस्मित मुलाक़ात सुर्खी बन गई. सामान्य शिष्टाचार भी अब गहन राजनीति का विषय बन गया है. बड़े झगड़े और दूरी हरदम छोटी बातों से होते है. दुर्योधन के गिरने पर यदि परिहास में द्रौपदी ने अंधे पिता के अंधा पुत्र की उपमा ना दी होती तो संभवतः परिवार का महाभारत टल जाता, द्रौपदी के बाल ना खुलते और ना ही उनके चीरहरण कुत्सित प्रयास किया गया होता. शब्दों के बाण की चोट बड़ी खराब होती है जो इन चोटों को शालीनता से झेल कर भुला दे, वह बड़ा होता है. श्रीमती सोनिया गाँधी जी पर सपा प्रवक्ता के रूप में मैने काफी बाण छोड़े थे परन्तु “न्यूक्लियर डील” के वक्त हुई कई अन्तरंग राजनैतिक मुलाकातों में अतीत में मेरे द्वारा कही बातों का दूर-दूर तक कोई सन्दर्भ ना देकर उन्होंने मुझे बहुत लज्जित किया.

अटल जी की सरकार गिरने के बाद श्री चंद्रशेखर भी सोनिया जी के विरुद्ध थे और आदरणीय अडवानी से हुई उनकी मुलाक़ात और इसके बाद श्रीमती जया जेटली के घर पर हुई जार्ज फर्नांडीस साहब और श्री मुलायम सिंह जी की मुलाक़ात ने गैर कांग्रेसवाद की सियासत को काफी प्रखरता दी. यह सब खुलासा शायद मै नहीं करता परन्तु अपनी आत्मकथा में आदरणीय अडवानी जी ने यह राज पहले ही खोला हुआ है. उन्ही दिनों चंद्रशेखर जी की मुलाक़ात सोनिया जी से हुई और पूरी तरह उनका मन सोनिया जी के लिए सकारात्मक हो गया. जब तक चंद्रशेखर जी और सोनिया जी में दूरियां और संवादहीनता थी, मेल-जोल बिल्कुल नहीं था और यह दूरियां जब नजदीकियों में तब्दील हुई तो मरते दम तक चंद्रशेखर जी का पूरा हाल बिना बताए गुपचुप सोनिया जी लेती रहीं. अब प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री पद ठुकराने के बाद भी, सत्ता की राजनीति से दूरी रखने के बावजूद सोनिया जी पर हमले क्यूँ है? इसका एक ही उत्तर है, “फलदार के नसीब में है पत्थरों की चोट”. कुछ करना है तो सहना है, झेलना है और सह कर, झेल कर भी हर्षित, प्रफुल्लित और मुद्रित रहना है. विषाद, पीड़ा, धोखाधडी, बेबुनियाद आरोपों की झड़ी झेलना, सहना और फिर भी अवसर मिलते ही दूरियों को दूर करना, यह गाँधी परिवार की परम्परा है. याद कीजिये, स्वयं इंदिरा जी से चिकमंगलूर में भीषण चुनाव लडने वाले कर्नाटक के श्री वीरेंद्र पाटिल इंदिरा जी द्वारा ही चुनाव के कुछ दिनों बाद ही कांग्रेस में लाए गए.

“जिनके महलों हज़ारों रंग के फानूस थे, झाड उनकी कब्र पर है और निशान कुछ भी नहीं”

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