कहीं कभी आपने देखा या सुना है कि सांप और नेवला साथ-साथ हों. यह अजूबा पिछले दिनों भारतीय राजनीति में देखने को मिला. भाई अरुण जेटली और अखिलेश यादव एक ही दिन एक ही कार्यक्रम में एक ही शहर में गिरफ्तार हुए. हद तो तब हो गई जब सपा नेता अबू आजमी और श्री गोपीनाथ मुंडे मुम्बई में हाथ में हाथ डाले एक साथ गिरफ्तार हुए. वामपंथी नेताओं ने जब सदन में महंगाई के मुद्दे पर “कट मोशन” लाया तो लालू जी और मुलायम जी ऍन वक्त पर यह कहके भागे कि इस मुद्दे पर भाजपा और वामपंथी साथ है तो हम धर्मनिरपेक्ष सियासत का भाजपाईकरण कैसे कर दे. फिर कलकत्ता से सपा सुप्रीमो का बयान आया कि ममता सिंहासन जल्द खाली करो, हम समाजवादी यूं.पी.ए. मंत्रिमंडल में तुम्हारी जगह आने को आकुल व्याकुल है. ममता टिकी रही, डटी रही, अड़ी रही, जीत गई और उन्हें भगा कर उनकी जगह लेने का ख्वाब देखने वाली सपा डुमरियागंज उपचुनाव में पार्टी नंबर चार हो गई. सपा प्रमुख कहने लगे “मेरा सुन्दर सपना टूट गया, मै सियासत में सब कुछ हार गया बेदर्द विरोधी जीत गया”. ममता के न जाते ही फिर सपा भाजपा के हाथ में हाथ डाल कर कहना शुरू किया “साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा मिल कर बोझ उठाना” और सपा भाजपा गठबंधन लखनऊ से ले कर मुम्बई तक हाथ में हाथ डाले साथ-साथ दिखाई दिया. साक्षी महराज, कल्याण सिंह और अब मुंडे तक साथ साथ है.

यहाँ लालू जी और पासवान जी की तारीफ करनी पड़ेगी कि यह लोग सरकार का विरोध करने के लिए अपनी सियासत का भाजपाईकरण करने से गुरेज कर गए एवं स्वयं को सपा नेतृत्व से दूर रखा. यहाँ तक कि एन.डी.ए. का सहयोगी दल होने के बावजूद बिहार में नितीश कुमार जी ने अपनी सियासत का भाजपाईकरण रोकने के लिए खुले आम नरेन्द्र मोदी जी की खिलाफत कर दी. डूबते को तिनके का सहारा होता है. कल डॉ अयूब लखनऊ में मिले थे और कह रहे थे कि समाजवादी पार्टी के सन्देश गठबंधन के लिए लगातार मिल रहे है और भाई ओमप्रकाश राजभर जी संभवतः सपाइयों की बात सुने. अब साक्षी महराज, कल्याण सिंह जी के साथ के बाद भाजपा के साथ मिल कर मुंडे जी के साथ मुम्बई में गिरफ्तार होने वाली उत्तर प्रदेश की पार्टी नंबर चार से मुसलमानों रहबर और उनकी पार्टी “पीस पार्टी” या डॉ अयूब क्या कभी बात भी कर पाएँगे? लालू जी और पासवान जी के अलग-थलग रहने के बुद्धिमान सियासी निर्णय को इस प्रकाश में देखा जा सकता है कि भले ही वह केन्द्र सरकार की महंगाई की नीति के मुखालित हों लेकिन धर्मनिरपेक्ष सियासत की कीमत पर किसी भी सूरतेहाल में भाजपा या संघ परिवार के साथ नहीं दिखना चाहते. कुछ दल उनकी इस सियासी सूझ-बूझ का लाभ ले वरना होगा यह कि,

“ना खुदा मिला ना बिसारे सनम, ना इधर के रहे हम ना उधर के रहे हम.”

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