अच्छाई, बुराई, रात, दिन, अरुणोदय की लालिमा, अमावस्या की कालिमा, यश, अपयश, भूख, प्यास, अमीरी, गरीबी, सच, झूठ, मक्कारी, ऐयारी, कृतज्ञता, कृतघ्नता, अन्धकार, प्रकाश, काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णा, संतुष्टि, मृगत्रिष्णा, यथार्थ, कल्पना, भावना, भंगिमा, संकल्प, अधिकार, कर्तव्य, कायरता, नीति, दुर्नीति, प्रसिद्धी, गुमनामी, यह शब्द नहीं बल्कि शाश्वत एवं अनंत मानव समाज की अनुभूतिया है जिनका प्रतिपादन और प्रतिफल का दायरा तय करने की आधारशिला हमारी नैतिकता है. यह नैतिकता एक महीन डोर है और यह डोर ना टूटे, कायम रहे, इसके लिए आवश्यक है, हमारा अपना विवेक.

कल “टाइम्स नाऊ” के वाद-विवाद में श्रीमती नलिनी सिंह ने कहा कि हम पत्रकारों को राजनेताओं से दूरी रखनी चाहिए. “फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व” की दूर संचार नीति एवं किसी खास औद्योगिक घराने को लाभ देने के लिए दूर संचार नीतियों में शिथिलता का समावेश, ऐसी अवधारणा है कि मेरे अपने गहरे दोस्त स्वर्गीय प्रमोद महाजन ने संचारमंत्री के रूप में किया था. श्री अरुण शौरी के अनुसार उन्होंने सी.बी.आई. को दिये अपने बयान में टेलीकाम नीतियों के सन्दर्भ में बहुत कुछ बताते हुए यह भी बताया कि उन्होंने अपने दल भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी इसकी जानकारी दे दी थी. श्री दयानिधि मारन ने इसी नीति को आगे बढ़ाया. सरकारी आदेश किसी एक मंत्री के नहीं होते और ना ही किसी सरकार या पार्टी के. मंत्री, सरकार, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका एक व्यवस्था है और इस व्यवस्था के निर्णय का सम्मान नागरिकों का कर्तव्य है. अब अगर इसके मूल में भ्रष्टाचार का विष समाहित है तो बाहर के देश से आये निवेशकों का क्या कसूर है. भारत सरकार के दस्तावेजों के आधार पर 2G स्पेक्ट्रम के प्रोजेक्ट में ऋण देने वाले बैंकों का क्या कसूर है.

अवकाश प्राप्त माननीय न्यायमूर्ति श्री के.जी. बालाकृष्णन एवं उनके निकटवर्ती रिश्तेदारों की अकस्मात बढ़ी पूंजी चर्चा में है. यदि मंत्रियों के निर्णय पर पुनर्विचार उनके विवादित व्यक्तित्व के कारण हो रहा है तो क्या देश के बड़े औद्योगिक घराने के दो भाइयों के विवाद पर अभी विवादों में घिरे माननीय न्यायमूर्ति श्री के.जी. बालाकृष्णन के फैसले की पुनः सुनवाई भी आज की ईमानदार एवं स्वच्छ अदालत में राडिया टाटा टेप के परिपेक्ष में करेगी? शायद नहीं क्योंकि न्यायपालिका को छुए जाने की परम्परा ही नहीं है. किसी मंत्री के जेल जाने की, मुख्यमंत्री को हटाए जाने की, टाटा-अम्बानी जैसे देश के बड़े उद्यमियों को विवादित करने की भी तो परम्परा नहीं थी.

विपक्ष ने 2G का विवाद उठाया, सरकार ने वी.एस.एन.एल. की जांच शुरू कर दी. वी.एस.एन.एल. की डील को मैने स्वयं तत्कालीन सरकार का “आर्थिक आतंकवाद” कहा था और मेरे ऊपर टाटा के कहने पर नीरा राडिया ने क्रिमिनल डीफेमेशन का मुकदमा किया था जो मैं टाटा-राडिया से जीत गया. टाटा साहब और राडिया मेमसाहब 2G के कथित घोटाले के बाद अब वी.एस.एन.एल. और उससे जुडी जमीन के विवाद की बात संचारमंत्री श्री कपिल सिब्बल ने की है. क्या आप दोनों उनपर भी क्रिमिनल डीफेमेशन का केस करेंगे या आपका चारा मुझ जैसा मामूली आदमी होगा. वो कहते है ना कि “कमजोर की लुगाई, सबकी भौजाई”.

श्री सोमनाथ चटर्जी का एक बयान आया है कि न्यायपालिका कार्यपालिका का काम, कार्यपालिका पुलिस इन्वेस्टिगेशन का काम और विधायिका शोरगुल के काम में मसरूफ है. मुल्क का अल्लाह मालिक! भाजपा और सत्ताधारी दल की प्रतिद्वंदिता की कटुता की प्रतिस्पर्धा मुझे सुश्री जयललिता और माननीय करूणानिधि जी के स्तर पर आ गई लगती है. और इस पर सोने पर सुहागा है “जूडिशियल एक्टिविस्म” और इससे जुड गई है विजुअल मीडिया की टी.आर.पी. की बात. गंगा, जमुना और सरस्वती की त्रिवेणी में सरस्वती को तो लुप्त होना ही पडता है और कही ना कहीं कामकाजी व्यवस्था की सरस्वती का भी लोप शुरू हो गया है.

बड़े उद्यमी सुरक्षित नहीं, उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायमूर्ति सुरक्षित नहीं, केन्द्र के मंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री सुरक्षित नहीं, इनके निर्णयों पर कामकाज करने वाला अफसर और बैंकर भी सुरक्षित नहीं. नैतिकता का कठोर डंडा आज भी श्री मनमोहन सिंह पर मीडिया, न्यायपालिका, और विपक्ष चला रही है. विपक्ष की बल्ले-बल्ले है पर कल यही बल्ले-बल्ले टीम गुजरात के दंगों और रेड्डी बन्धुओं के कारनामों के नाम पर इन्ही राहों से गुजरात और कर्नाटक तक जा पहुँची तो विपक्ष के दोस्तों आपकी बल्ले-बल्ले भी शुरू हो जाएगी. आइये हम नैतिकता के दोहरे मापदंडों को मिलजुल कर खत्म करें और भविष्य के लिए नैतिकता का एक वैव्हारिक दंड सर्वसम्मति से निर्मित हो जो आपसी ईमानदारी की दधिची की हड्डी का वज्र बन कर सब बेईमानों और बेईमानियों का विनाश करे. यह नहीं के अगर बेईमान हमारा तो मीठा-मीठा इसे घूँट लू और तुम्हारा तो तीता-तीता इसे थूंक दूं.

इलेक्शन फंडिंग की पारदर्शिता, पक्ष-विपक्ष का मानवीय समन्वय, सियासती प्रतिस्पर्धा को निजी रंजिश से दूर रखने की प्रवृत्ति, ये वो विधाएं है, जिससे कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका एक दूसरे से टकराव बिना व्यवस्था को अव्यवस्थित किये बगैर अपने दायरे की परिभाषित गरिमा के आवरण में रह कर सुचारू रूप से कार्यरत रह सकती है. मुझ पर मुकदमा दागने के बावजूद मेरे दिल में टाटा-राडिया के लिए और टेप निजी बात-चीत के लीकेज के बावजूद बरखा दत्त और वीर सांघवी के लिए भी गहरी संवेदना और सहानुभूति है. क्योंकि टाटा, नीरा राडिया, बरखा दत्त और वीर सांघवी एक दिन में तो नहीं बने पर सदियों का इनका व्यक्तित्व लम्हों ने बिगाड़ डाला.

“हम में ही थी न कोई बात याद जो तुमको आ सके,
तुमने हमें भुला दिया हम न तुम्हे भुला सके.

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