देश की आज़ादी के ६० से भी अधिक वर्षों के बाद भी उत्तर प्रदेश देश के सबसे अधिक पिछड़े राज्यों में गिना जाता है. क्षेत्रफल और जनसंख्या के हिसाब से उत्तर प्रदेश दुनिया के अधिकतर देशों से बड़ा है और अगर विशेषज्ञों की माने तो इतना बड़ा अकार प्रदेश के विकास के रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है. प्रदेश का पूर्वी हिस्सा जो कि पूर्वांचल के नाम से जाना जाता है, बाकी प्रदेश के मुकाबले सबसे ज्यादा पिछड़ा है. यहाँ की यह बदहाली औद्योगिक शून्यता, रोजगारपूरक शेक्षणिक संसाथानो की कमी, कुटीर उन्द्योगों की उपेक्षा के कारण उत्पन्न हुई है. जबकि प्रदेश से अलग किया हुआ उत्तराँचल तुलनात्मक ढंग से हर क्षेत्र में आगे निकल चुका है. किसी समय चीनी उद्योग के लिए सारे देश में विख्यात देवरिया जिले की अधिकतर चीनी मिले या तो बंद है या फिर बंदी की कगार में है. कमोवेश यही स्थित पूर्वांचल की अधिकतर चीनी मिलों की है. यही हाल मऊ की स्वदेशी काटन मिल, परदहा की काटन मिल, बहादुरपुर और जौनपुर की स्पिनिंग मिल का है. यही नहीं हज़ारों लोगों को रोजी-रोटी देने वाला गोरखपुर का उर्वरक कारखाना दशकों से बंद पडा है. इसी तरह पूर्वांचल के कुटीर, कालीन, सिल्क, हथकरघा, पातरी व् अन्य उद्योग भी बहुत बुरी स्थित में है.

पूर्वांचल में सोनभद्र एक ऐसा इलाका है जहां की तमाम खनिज संपदा का दोहन कर प्रदेश सहित देश के अन्य प्रान्तों में भेजा जाता है. बीजापुर, अनपारा, शक्तिनगर, रेनूकोट, ओबरा, टांडा इत्यादि विद्युत् उत्पादन ग्रहों से उत्पन्न बिजली का अधिकाँश हिस्सा अन्य प्रान्तों में भेज दिया जाता है. पूर्वांचल के जिलों को उनकी आवश्यकता भर की भी बिजली नहीं दी जाती है, जिससे उनका विकास बिलकुल ठप्प पडा है. पर्यटन की द्रष्टि से पूर्वांचल में बहुत अधिक क्षमता है, जिसमे वाराणसी, कुशीनगर, इलाहाबाद, अयोध्या, फैजाबाद, गोरखपुर, बस्ती, मगहर, आज़मगढ़ इत्यादी में स्थित पर्यटन स्थल उल्लेखनीय है. परन्तु उपेक्षा की वजह से इन सारे स्थानों की क्षमता का एक चौथाई भी दोहन नहीं किया गया है. हद तो यह है कि गरीबी और बदहाली से परेशान पूर्वांचलवासी जब रोजी-रोटी की तलाश में अन्य प्रान्तों में जाते है तो उन्हें पूर्वांचली कह कर के अपमानित किया जाता है. बात तो यहाँ तक बढ़ गयी है कि भाषा और क्षेत्र के नाम पर आज-कल पूर्वांचलियों को मारा-पीटा भी जा रहा है.

अभी तक पार्टी की मर्यादा में बंधे होने की वजह से मै पूर्वांचल और अन्य छोटे राज्यों के निर्माण का समर्थन नहीं कर सका था. परन्तु अब समाजवादी पार्टी से बाहर आने के बाद मै खुले तौर पर कह सकता हूँ कि उत्तर प्रदेश के विकास के लिए प्रदेश का छोटे राज्यों में बटवारा करके के पूर्वांचल, हरित प्रदेश और बुंदेलखंड का निर्माण आवश्यक है.

Bookmark and Share