जीवन परिवर्तनशील है और बदलाव जीवन की एक नितांत सत्यता. बदलाव सिर्फ बड़े होटलों की लाबी का ही नहीं, इंसानी रिश्तों का भी होता है. निर्जीव बदलाव पीड़ाहीन और सजीव बदलाव पीड़ायुक्त होता है. बदलाव एक विभीषिका के बाद का वरदान भी हो सकता है. जापान को ही देख ले, हिरोशिमा और नागासाकी के बाद यह देश आधुनिक विश्व में तकनीकी के क्षेत्र का सबसे बड़ा विकसित देश बना. युगों की संस्कृति की धरोहर का हमारा यह महान देश आज भी किसी विभीषिका का सामना ना किये जाने के कारण जापान नहीं बन पाया. २६/११ की दुर्घटना की विभीषिका ने भले ही मुम्बई समेत सारे देश वासियों का दिल दहला दिया हो, परन्तु सुरक्षा के मामले में हमें सजग अवश्य किया है.

बहुत दिनों के बाद अपने टूटे मन से जुडी अपनी पुरानी यादों और रिश्तों को, जो साथ के साथियों की खुदगर्जी की विभीषिका का शिकार बनी, मैने अपनी जीवन प्रणाली से मुक्त कर डाला है. प्रकति का अनूठा आचरण है, लोग अपने माता, पिता, पत्नी और इकलौती संतति की मौत भुला देते है, यह तो ईश्वरीय प्रदत्त जन्मजात रिश्ते नहीं बल्कि स्वनिर्मित रिश्तों का खँडहर है. इस विभीषिका से डरना क्यों? इससे भागना कैसा? इसका तो सामना करना ही पडेगा. बच्चन जी की ईमानदार आत्मकथा में भी उनके और आदरणीय सुमित्रानंदन पन्त जी के परस्पर स्नेह का बदलाव उद्दत है. दशकों पूर्व बदलाव जितना प्रासंगिक था उतना ही आज के युग में भी है. स्वार्थ, लालच, पद-लोलुपता, अहंकार और मैं जब तक मानव में जीवित है, बदलाव भी निश्चित है. ईश्वर मुझे मेरे जीवन में तथाकथित अपनों के बदलते आचरण की विभीषिका को सहने की शक्ति दे और मै उनके इस आचरण के बदलाव का स्वागत का स्वागत गीत गाता हुआ कहता हूँ:

“कुछ लोग मोहब्बत में बरबाद किया करते है,
कुछ लोग मोहब्बत में बरबाद हुआ करते है.”

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