२०१२ के उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनावों के पहले का आखिरी उपचुनाव डुमरियागंज में संपन्न हुआ जिसके झकझोर देने वाले निर्णय ने सभी तथाकथित बड़े दलों के सपनों को धूलधूसरित कर दिया है. २००७ के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को ३१६५३ (२५%) मत, बहुजन समाज पार्टी को ३२६२६ (२५.७%) मत मिले और बसपा ने सपा से मात्र ९७३ मतों से आगे रह कर चुनाव जीता. २००७ के इसी चुनाव में २८८३६ (२२.७%) मत प्राप्त कर भाजपा तीसरे स्थान पर और १८४२६ (१५.३%) मत ले कर कांग्रेस चौथे स्थान पर रही. आइये २००७ के नतीजों की तुलना हम आज ही संपन्न हुए डुमरियागंज उपचुनाव से करें. यहाँ बसपा पुनः जीती लेकिन जहां २००७ में यह ९७३ मतों से सपा से जीती थी, अब स्थिति यह है कि समाजवादी पार्टी जो दूसरे नंबर पर थी चौथे नंबर पर गई, कांग्रेस जो चौथे नंबर पर थी अपने स्थानीय सांसद जगदम्बिका पाल की उपस्थिति के बावजूद पांचवे नम्बर पर पहुँची और तीसरे नंबर पर रही भाजपा सीधे सपा के २००७ की कद कांठी पर पहुँच कर बसपा से सीधे मुकलाबले पर खड़ी हो गई, वह भी तब, जब प्रदेश में मंदिर मुद्दा नहीं रहा, श्री राजनाथ सिंह जी राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं रहे और वर्त्तमान में उत्तर प्रदेश भाजपा के पास कोई उर्जावान नेतृत्व भी नहीं है.

इस पूरे प्रकरण में सपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों से अधिक मजबूत बन कर लोकमंच समर्थित पीस पार्टी के उम्मीदवार का अभ्युदय उल्लेखनीय है. यदि लोकमंच/पीस पार्टी की तरफ से श्री मनोज तिवारी पहुंचे तो कांग्रेस की ओर से नगमा और रवि किशन. यदि श्री ओबैदुल्ला अजमी लोकमंच/पीस पार्टी का प्रचार किये तो अपनी ससुराल डुमरियागंज में सपा के मुस्लिम नेता अबू हासिम आज़मी, श्री शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के साथ अंत तक डटे रहे और सपा ने तन, मन, धन से मेरे बगैर और बिना मेरे सहयोग के यह पहला चुनाव लड़ा. रहा सवाल कांग्रेस का तो यहाँ के स्थानीय सांसद श्री जगदम्बिका पाल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और एक रात के ही सही मुख्यमंत्री रह चुके है. और उन्हें लगातार १० वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे राजनैतिक पुरोद्धा भाई दिग्विजय सिंह जी का भी सहयोग रहा है. चुनाव की घोषणा से पहले मै मात्र एक बार डुमरियागंज गया था और बाद की अस्वस्थता ने आगे का कार्यक्रम नहीं बनने दिया फिर भी जिस तरह लोकमंच समर्थित पीस पार्टी ने बड़े दलों कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से अधिक बढ़त दिखाई है, यह अपने आप में हार में भी जीत और २०१२ के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का ड्रेस रिहर्सल है.

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि यदि सपा और लोकमंच समर्थित उम्मीदवार के मतों को जोड़े तो बसपा निश्चित हार रही है और यदि कांग्रेस और लोकमंच समर्थित उम्मीदवार का वोट जोड़े तो भी कड़ी चुनौती बसपा को मिल रही है. प्रदेश में मृतप्राय भाजपा का उत्थान गैरभाजपाई दलों को सचेत करने के लिए काफी है. जल्द से जल्द ठोस राजनैतिक विकल्प का ना उभर पाना पहले बसपा और उसके बाद भाजपा के पक्ष में होगा. स्थानीय सांसद चुना हुआ कांग्रेसी हो, फिर भी कांग्रेसी उम्मीदवार पांचवे स्थान पर हो. झंडा, डंडा, संसाधनविहीन मुझ बेचारे अमर सिंह के कम जाने जाने वाले दोस्त डॉ अयूब की पीस पार्टी वर्त्तमान में प्रदेश के विपक्षी दल समाजवादी पार्टी को चौथे पर और कांग्रेस को पांचवे स्थान पर रख पाए, यह भी भारी उपलब्धी है. डॉ अयूब और अति-पिछड़े नेता श्री ओमप्रकाश राजभर जी को इसके लिए बधाई. सपनों की टूट के लिए समाजवादी पार्टी को भी बधाई. संभवतः नींद से जगकर अब वह यथार्थ में जीना सीखले.

“काफी है मेरे दिल की तसल्ली को यही बात, आप आ ना सके आपकी हार का पैगाम तो आया.”

Bookmark and Share