मेरे कल कल के गाजीपुर दौरे में नए अन्जान मित्रों की भारी भीड़, पुराने जाने-माने चेहरों की अनुपस्थिति, साउंड बाईट, साथ में जया बच्चन जी और भोजपुरी गायक मनोज तिवारी जी थे. आजकल काफी तनाव में रहता हूँ. किडनी प्रत्यारोपण के बाद निर्धारित ब्लड टेस्ट की प्रतिक्षा आशंकित तनाव दे रही है कि कहीं फिर से पुरानी हालत में न जा पहुंचू. एकाएक उन पुराने साथियों की याद आयी जो साथ जीने-मरने की कसम खाते थे, अब गायब है. फिर भी भाग्यशाली हूँ कि पार्टी के कई सांसद, विधायक और ढेर सारे कार्यकर्ता मेरे साथ है. गाजीपुर की सभा में भारी भीड़ आई, पत्रकारों ने पूछा कि क्या मैने मायावती की तारीफ़ की है, मैने जवाब दिया बिल्कुल नहीं. साथी भाई अखिलेश जो राजनीति में मेरे वरिष्ठ है, ने बतियाते हुए कहा कि यह पुरानी समाजवादी संस्कृति है कि साथ रहो तो अच्छे और ज़रा हटे तो गेस्ट हाउस के बंदी जैसे मायावती जी या “निपट बेशर्म” जैसे कि मैं अमर सिंह. मुह से सहज निकला कि पुरुष होकर राजनैतिक निष्ठुरता मुझे इतना पीड़ित करती है तो महिला मायावती जी को गेस्ट हाउस काण्ड कितना कष्टदायी रहा होगा.

राजनीति में न सह पाना कितना कठिन है. जया बच्चन जी ने सलाह दी कि चुप रह कर सह-सह कर आप शालीनता के साथ चलते रहिये. मेरे दिल ने पूछा और याद किया कि मेरे दोस्तों कहाँ हो तुम, तब-तक मुझे बेशर्म कहलाने वाले मेरे नेता का टीवी सन्देश मेरे स्वास्थ की चिंता पर आ गया. बड़ी कृपा, बड़ी मेहरबानी. लेकिन अब मै मन की सुनूंगा, सच की बात कहूंगा कीमत चाहे जितनी चुकानी पड़े. चाहे महिला आरक्षण का समर्थन हो, या फिर पूर्वांचल विकास यात्रा की घोषणा या फिर हरित प्रदेश और बुंदेलखंड का निर्माण, निष्पक्षता और ईमानदारी से जो करूँगा, कहूंगा सच ही होगा. अच्छा होगा यदि प्रमुख विरोधी दल अगला मुख्यमंत्री पढ़ा-लिखा मुसलमान या अति-पिछड़ा वर्ग का बनाने का ऐलान कर दें. संगठन में प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व ढकोसला है. यादव भाइयों के मुकाबले कितने कुशवाहा, शाक्य, निषाद और चौहान भाइयो को २०१२ के विधान सभा चुनावों में टिकट मिलता है, यह देखना है. मै जातिवादी, परिवारवादी और निरंकुश राजनैतिक व्यक्ति नहीं पर उत्तर प्रदेश की अब तक की सरकारों ने समाज के कुछ वर्गों का ही पोषण और बाकियों का शोषण किया है. अतः समाज के दूसरे छूटे तबकों की बात करना और उठाना मजबूरी है. यह बेचारे बिखरे एवं असंगठित बिना जुबान के दबे कुचले लोग है. कौन सा दल मेरा होगा, मै कहाँ होऊंगा, पता नहीं पर इतना तय है कि मुझे पद या प्रतिष्ठा मिले या न मिले पर मुझे इन तबकों की जुबान बनने से कोई नहीं रोक सकता, चाहे वह मेरा अपना दल हो या मेरे अपने नेता या फिर मेरे अपने स्वजातीय प्रवक्ता ही क्यूँ न हों. अगर मुझसे कोई गलती हुई हो तो इतना ही कहना है,

“वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा, चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों.”

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