Shri Chandrashekhar
किसी की माने तो दिल से माने, मन ना माने तो कोई बात नहीं! आदरणीय मुलायम सिंह जी व्यवहारिक राजनेता है और अपने राजनैतिक शत्रुओं को भी उन्होंने मान दिया है. श्री बेनी वर्मा, राज बब्बर जी और आज़म खान से बिछड़ने के बाद भी ना तो खुद, नाही उनके परिवार ने और नाही उनके प्रवक्ता ने किसी भी नेता को अपशब्द कहे थे. कांग्रेस, बसपा और पूर्व समाजवादियों में मै अमर सिंह उनकी इस प्रकति के विपरीत उनके परिवार और दल के विशेष कोपभाजन का शिकार हुआ हूँ. आदरणीय चंद्रशेखर जी के साथ समाजवादी जनता पार्टी में श्री मुलायम सिंह रहे लेकिन यकायक उन्हें बिना बताए चल पड़े और अपना दल बना लिया. चंद्रशेखर जी के बहुत ही करीबी रहे मित्र माधव जी जो चंद्रशेखर जी की छाया की तरह थे, उन्होंने मुलायम सिंह जी इस कृत्य को कभी भी क्षमा दान नहीं दिया. गौरी भैया बलिया में और आजमगढ़ में बच्चा बाबू ने मुलायम सिंह जी की गाजीपुर के श्री रामकरण यादव जी की चंद्रशेखर जी के प्रति की गई तीखी आलोचना को जो कि चंद्रशेखर जी द्वारा विधानसभा के कई टिकटों के काटने के कारण हुई थी, आज तक नहीं भूल पाए है. यह सीधा आरोप चंद्रशेखर जी पर लगा था कि जनता पार्टी के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कई पिछड़ों का टिकट काट कर जिसमे गाजीपुर के रामकरण यादव जी भी थे, चंद्रशेखर जी ने यादव विरोधी राजनीति को हवा दी थी.

चंद्रशेखर जी ने राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह जी की मुलायम विरोधी सियासत के खिलाफ हमेशा मुलायम सिंह जी का साथ दिया. लेकिन एन वक्त पर चंद्रशेखर-देवीलाल के मुकाबले हमारे नेता जी सत्ता की दौड़ में राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ खड़े हो गए. हाँ एक बात की तारीफ़ जरूर करनी पड़ेगी कि चंद्रशेखर जी को हर लोकसभा चुनावों में मुलायम सिंह जी ने बिना मांगे मदद भी की लेकिन कम लोगों को पता है वह नीरज शेखर जो आज दलीय सभाओं में मेरे बारे में मुलायम सिंह जी के कहने पर टिपण्णी करते है मुझ पर अपने परिवार के पप्पू सिंह को विधान परिषद् का टिकट दिलवाने का भारी दबाव बनाया था जिसे श्री मुलायम सिंह जी और उनके लोगों ने सिरे से यह कह कर ख़ारिज किया कि नीरज/पप्पू की जोड़ी बलिया की राजनीतिक ताकत का संतुलन यादवों से छीन कर ठाकुरों के पास ले जायेगी. यह अलग बात है कि पप्पू फिर भी जीत गए क्यूंकि कहते है कि “वीर भोग्या वसुंधरा”.

आज क्षत्रियों का वोट लेने के लिए चंद्रशेखर जी को विशेष रूप से भुनाने का प्रयत्न कर रही समाजवादी पार्टी को मालूम रहे सच थक सकता है, हार नहीं सकता और चंद्रशेखर जी, अमर सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, सपा संसथापक पूर्व सांसद कुंवर अखिलेश प्रताप सिंह और लगभग सभी जाने-माने क्षत्रियों के साथ किया गया राजनैतिक सच जयंती मानाने से, मोहन सिंह का दुरुपयोग करने से उजागार नहीं होगा, ऐसा सोचना और मानना ऐयारी होगी. क्षत्रियों को छोड़े पहले अपने ही दल के अति-पिछड़ों और मुसलमानों को अपने निजी परिवार के मुकाबले आगे लाएँ, यही चंद्रशेखर जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी. चंद्रशेखर जी ने लोहिया जी, जयप्रकाश जी और आचार्य नरेन्द्र देव की तर्ज पर जीवन पर्यंत अपने परिवार की राजनीति नहीं की. चंद्रशेखर जी ने अपने जीवन काल में बेटे नीरज और भाई कृपाशंकर को राजनीति की चकाचौंध दुनिया से अलग रखा. चंद्रशेखर जी के परिवार में रामगोपाल, अखिलेश, शिवपाल, धर्मेन्द्र और डिम्पल की कमी नहीं थी. जहां तक मुझे स्मरण है पहली बार श्री रामगोपाल जी संसद में समाजवादी जनता पार्टी की तरफ से चंद्रशेखर जी के नेतृत्व में मुलायम सिंह जी के दबाव में भेजे गए थे. चंद्रशेखर जी ने मुलायम सिंह जी की बात मान तो ली थी पर भविष्य में लगने वाले परिवारवाद के इल्जाम के बारे में उन्होंने मुलायम सिंह जी को सावधान भी किया था. संभवतः अपने परिवार को फलने फूलने के लिए मुलायम सिंह जी ने चंद्रशेखर जी को राजनैतिक अलविदा कहा था उसके बाद गौरी भैया, माधव जी, मनोहरलाल जी, गौतम जी और ओमप्रकाश श्रीवास्तव जैसे वफादार ही चंद्रशेखर जी के साथ रह गए थे जबकि उनकी राजनैतिक पाठशाला के कई विद्यार्थी श्री ओमप्रकाश सिंह, अम्बिका चौधरी, रामगोविंद चौधरी और जसवंत सिंह इत्यादि मुलायममय हो कर सत्ता सुखलीन हो गए. समाजवादी पार्टी द्वारा चंद्रशेखर जी के लिए अचानक जाग्रत प्रेम को देख कर कुछ ऐसा लगता है:

“गुज़री है क्या मरीज पे अल्लाह को खबर, आँखों में खून आ गया तीमारदार का”

और चंद्रशेखर जी के अंतिम दिनों में यदि किसी ने दिल से उनकी बीमारी की तीमारदारी बड़ी खामोशी से बिना आवाज के की तो उस सख्शियत का नाम है श्रीमती सोनिया गाँधी. नीरज को यह सच मानने में समाजवादी तकलीफ हो सकती है लेकिन कोई उनके भाइयों से और बड़े बेटे पंकज से भी तो पूछे.

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