श्री राजीव जी को मै बहुत कम यानी ना के बराबर जनता था. उनके अभ्युदय काल में मै कलकत्ता में बड़ा बाजार जिला कांग्रेस कमेटी का सचिव हुआ करता था. मै श्री सुब्रत मुखर्जी, जो अभी हाल तक तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के पहले तक पश्चिम बंगाल कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष थे, के काफी करीब था और सुब्रत दा आदरणीय प्रणव दा के बेहद करीबी थे. बंगाल कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता श्री सोमेन मित्र जिन्हें हम सब छोटे दा के नाम से पुकारते थे श्री गनी खान चौधरी के साथ थे, श्री सोमेन मित्र भी अब ममता जी के साथ है. गनी खान जी और प्रणव दा का गुट और दोनों सिपाहसलार आज भले ही सर्वश्री सुब्रत मुखर्जी और सोमेन मित्र, ममता जी के साथ हो परन्तु १९८४ के दौर में आपस में बड़ी कटुता के साथ वामपंथियों के मुकाबले आपस में ही लड़ा करते थे. लड़ाई का आलम कुछ ऐसा था कि एक बार तो इंदिरा जी की उपस्थिति में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष गनी खान साहब की खासी कुटाई हो गई थी. १९८४ में जब राजीव जी बंगाल का दौरा लगाए तो इस मतभेद से बचने के लिए उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल के दौरों का बटवारा श्री गनी खान चौधरी और श्री प्रणव दा और इसी क्रम में उनके सिपाहसलार सर्वश्री सुब्रत मुखर्जी और सोमेन मित्र के बीच कर दिया था. इंदिरा जी के दुखद निधन के दिन हम सब प्रणव दा और सुब्रत दा के साथ-साथ राजीव जी के साथ दक्षिण बंगाल के दौरे पर थे. मुझे नजदीक से पहली बार राजीव जी वही दिखे और मिले. युवा, सह्रदय, उर्जावान, परम्पराओं से इतर कुछ अलग थलग दिखने और करने के इरादों से परिपूर्ण उनका व्यक्तित्व लगा.

इस मुलाक़ात से पूर्व मुंबई महाधिवेशन में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दिया उनका संबोधन मैने कार्यकर्ता के रूप में सुना था जहां वह मंच पर थे और सामान्य कांग्रेसी सांसद के रूप में श्री अमिताभ बच्चन और श्री सुनील दत्त जैसे पुरोद्धा मंच के नीचे जमीन पर. उनका वक्तव्य कि विकास के लिए आबंटित पैसा गरीबों की जेब की बजाय सिस्टम लील जाता है, आज भी प्रासंगिक है. उसी दौरान प्रणव दा के कमरे में जब मै और सुब्रत मुखर्जी बैठे हुए थे तो अकस्मात् अनौपचारिक रूप से उनका पदार्पण हुआ और बिना किसी लम्बी प्रस्तावना के दो टूक अपनी बात कहकर वह चलते बने. मनमोहन सिंह के आर्थिक उदारीकरण को संभवतः राजीव जी पहले ही करना चाहते थे पर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह जी वित्त मंत्री के रूप में उस आर्थिक उदारीकरण को समाजवादी ढांचे की नेहरूवादी संस्कृति की राजनीति के विरुद्ध मानते थे. यदि राजीव जी अपने मन की कर पाते तो संभवतः चंद्रशेखर जी के प्रधानमंत्रित्व काल में सोना गिरवी रखने जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना देश को नहीं करना पड़ता.

माधवराव सिंधिया जी ने मुझे मध्यप्रदेश के भिंड से लोकसभा का उम्मीदवार लगभग बनवा ही दिया था. उन्होंने मुझसे कहा कि आप अमिताभ बच्चन के मित्र है क्यों नहीं राजीव जी से उनके माध्यम से सिफारिश करवाते? मैने कहा कि राजनीति यदि सिंधिया जी मै आपके लिए कर रहा हूँ तो अहसान बच्चन साहब का क्यों लूं? ख़ैर उस समय मै मध्यप्रदेश से ए.आई.सी.सी. का निर्वाचित सदस्य था और प्रदेश की राजनीति में श्री दिग्विजय सिंह और श्री अर्जुन सिंह माधवराव सिंधिया जी के विरोधी थे, और अंतिम लिस्ट में भिंड से मेरे नाम की जगह पत्रकार उदयन शर्मा जी का नाम आ गया. मैने अमिताभ जी से कहा कि मेरा टिकट तो कट ही गया लेकिन अब आप मेरे लिए राजीव जी से बात कर ले और हो सके तो मुझे मिलवा भी दे. अमित जी ने राजीव जी से बात भी की और मुझे उनसे मिलवाने का वादा भी किया लेकिन नियति की क्रूर निर्ममता मेरी मुलाक़ात से पहले ही देश के इस होनहार सपूत को सदैव के लिए हमसे दूर ले गई.

भिंड श्री मुलायम सिंह यादव के गृह जनपद इटावा से लगा हुआ क्षेत्र है और मेरे और मुलायम सिंह के व्यक्तिगत संबंधों का लाभ उठा कर माधवराव जी भिंड मुलायम सिंह जी के सहयोग से कांग्रेस के खाते में लाना चाहते थे. मेरे सांसद होने की अतृप्त अभिलाषा की जानकारी श्री मुलायम सिंह जी को भिंड का टिकट कटने पर ही हुई और माधवराव जी जब श्री पी.वी. नरसिम्हा राव द्वारा कांग्रेस से निष्काषित हुए तो श्री मुलायम सिंह ने तत्काल मुझे अपने साथ जोड़ कर १९९६ नवम्बर में आखिर सांसद बना ही दिया. धन्यवाद नेता जी! यदि राजीव जी का निधन ना हुआ होता और पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार मेरी उनकी मुलाक़ात हुई रहती तो संभवतः मेरा गैर कांग्रेसी राजनीति से सामना ही ना हुआ होता. काश राजीव जी हमारे बीच और अधिक रहते तो राजनीति जो संवेदनहीन, स्वार्थपर, पेशेवरों और तिकड़मबाजों का अखाड़ा बन कर गई है, कुछ और तरह की होती… ग़ालिब ने कहा है,

“थी जो इक शख्स के तस्सवुर में, अब के रानाइये ख़याल कहाँ”

Bookmark and Share