रिश्तों की डोर बड़ी नाजुक होती है. इसको निभाने के लिए किसी ना किसी को झुकना होता है या टूटना होता है. अक्सर जो बड़ा होता है, समर्थ होता है, समझौता वही करता है. एक मित्र का यहाँ लन्दन में एक खाली बड़ा घर है पर राजपरिवार से सम्बद्ध मेरी पत्नी किसी के घर नहीं रुकना चाहती. लन्दन का सेंट जेम्स कोर्ट होटल भारतीयों का अड्डा है. हमारी मैडम को टर्की के बाद यहीं आकर हमारी बेटियों दृष्टि और दिशा के साथ आकर ठहरना था. पता चला श्री सुहेल सेठ, श्री हरीश साल्वे, श्री अरुण जेटली, श्री आनंद शर्मा, श्री हरि एवं श्रीमती कविता भरतिया, श्री चंद्रकांत और श्रीमती अमिता बिरला सभी यहाँ विचर रहे है. अभिनेत्री गुल पनाग और अभिनेता दिलीप ताहिल भी दिखाई दिए. बगल के ही अपार्टमेंट में अमित जी, जया जी, श्वेता, निखिल और बच्चे रुके हुए है. यह पता लगते ही मैने अमित जी को सूचित किया. पलट कर उनका जवाब तुरंत आया कि मै तो आज मुम्बई जा रहा हूँ. अपने लन्दन आने की खबर देकर मैने अपने दायित्व का निर्वहन कर दिया.

यहाँ स्थानीय लन्दन वासियों की जगह दिल्ली के मित्रों की उपस्थिति मन लगाए रखती है. बेटियों ने पूछा कि क्या ताई जी और श्वेता दीदी यहीं बगल में ठहरे है? मैने इस बात पर चुप्पी बनाए रखी. इन्हें यह बता कर क्या लाभ कि ताई जी अब मुलायम जी के साथ है और शायद लन्दन भ्रमणशील उनके बेटे और पार्टी अध्यक्ष अखिलेश और डिम्पल की कम्पनी में कहीं हों. राजनीति सब कुछ करा सकती है.

अपने मित्र सांसद कीथ वाज़, जो इंगलैंड के प्रथम भारतीय कैबिनेट मिनिस्टर रहे है, मुझे मिलने आए और कहने लगे कि मुझे डेविड मिलिबैंड से मिलना चाहिए. डेविड मिलिबैंड इंगलैंड की पिछली सरकार में विदेश मंत्री थे और अपने पिछले भारतीय प्रवास में श्री राहुल गाँधी के साथ हिंदुस्तान के गाँव में, जो राष्ट्रपिता गाँधी जी के अनुसार असली भारत है, रात्रि विश्राम किया था. डॉ राजेंद्र प्रसाद से डॉ कलाम तक हिंदुस्तान के इसी गांव के वातावरण से निकल कर राष्ट्रपति पद तक पहुंचे थे. ख़ैर मै कीथ वाज़ के साथ डेविड मिलिबैंड को मिला तो पता चला कि लेबर पार्टी के विरोधी दल के नेता के चुनाव में लेबर पार्टी में डेविड मिलिबैंड का उस पद के लिए विरोध कोई बाहर का व्यक्ति नहीं बल्की उन्ही का अपना सगा भाई एडवर्ड कर रहा है. इसलिए जान कर ताज्जुब नहीं हुआ कि सियासती खुमार देवर भाभी को अगल-बगल रहने के बावजूद एक दूसरे से मिलने की भी इजाजत नहीं देता. काश यह बात अमित जी जान जाते और मेरे साथ खड़े नहीं रहने का जो इनाम उन्हें राज्यसभा के पुर्न निर्वाचन के रूप में मिला था, उससे उन्हें वंचित न रख कर परिवारिक शांति सुनिश्चित रखते. आखिर मै कौन हूँ? परिवार जैसा था, परिवार न तो था, ना है, और ना अब परिवार बने रहने की सम्भावना ही बची दिखाई देती है. वाह रे राजनीति!

“तुम्हे गैरों से कब फुरसत, हम अपने गम से कब खाली,
चलो अब हो चुका मिलाना, ना तुम खाली ना हम खाली.”

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