आज अखबार में पढ़ा, अपने पुराने पहलवान नेता की माफीनामा का दांव देखा. भारतीय जनता पार्टी की मदद से तीन बार मायावती जी मुख्यमंत्री बनी, श्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में गुजरात जाकर प्रचार किया, फिर भी मुसलमान भाइयों को इतना बुरा नहीं लगा और गाहे बगाहे कई क्षेत्रों में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की हिमायत भी कर दी. इसके पीछे का कारण कि मायावती जी के भाजपाई रिश्ते के मुकाबले मुलायम सिंह जी की एक भूल भी मुसलमान माफ करने को तैयार नहीं है, मै अब बखूबी समझ रहा हूँ. मुसलमान भाइयों ने मुलायम सिंह जी को अपना रहबर मान कर उन्हें मौलाना मुलायम के खिताब से नवाज दिया था. आपरेशन ब्लू स्टार के बाद चंद्रशेखर जी ने बड़ी मायूसी से मुझसे कहा था कि सिक्खों के इतिहास का सही आंकलन किये बगैर की गई इस कार गुजारी के भयंकर परिणाम होंगे. सिक्ख भाइयों का गुरुद्वारा और मुसलमान भाइयों की मस्जिद, सिक्खो का नारा “जो बोले सो निहाल सतश्री आकाल” और मुसलमान भाइयों का “अल्लाह हो अकबर”, अपनी इबादत की जगह के प्रति उनकी निष्ठा का प्रदर्शन करती है. आप सिक्खो का क़त्ल कर दे, मुसलमानों को मार दे, पर खबरदार कुरआन, गुरु ग्रन्थ साहब, स्वर्ण मंदिर, मक्का और मदीना, और मस्जिद की शान में कतई कोई गुस्ताखी ना करे. मस्जिद की हिफाजत करने वाले अपने पहलवान नेता के लिए मैने भी कई बार चीख-चीख कर १४ वर्षों तक लगातार कहा कि “या अल्लाह जिसने तेरा घर तोड़ा, उसका गरूर तोड़ दे, या अल्लाह जिसने तेरा घर बनाया उसकी आबरू बचा दे”. मुसलमान भाइयों ने कहा बेशक! अमीन! लेकिन जब अल्लाह का घर बचाने वाला हमारा पहलवान और अल्लाह का घर तोडने वाले मिल-जुल कर एक अजब-गजब “काकटेली सियासत” करते है, जो ना अल्लाह के बन्दों की प्यारी हो और जो ना अल्लाह के बन्दों से तास्सुब रखने वालों को प्यारी हो. अखालियत ने पार्टी के रहनुमा को अपना रहनुमा बनाकर बेपनाह मोहब्बत दी, इसलिए इस रहनुमा के धोखे ने उसका वैसे ही दिल तोड़ा है जैसे कि १४ सालों की वफाओं के बदले गंभीर बीमारी के दौरान जफा ने मेरा दिल तोडा है. प्यार जितना गहरा होता है, नफ़रत भी उतनी ही गहरी होती है. गहरा प्यार मेरा और समाज के दबे कुचले वर्गों का, मुसलमानों का आपको मिला है तो नफ़रत भी आपको ही तकसीम होगी. आपकी बेदाग़ सियासी चुनरी में लगा यह दाग जल्दी मिटेगा नहीं.

कल्याण सिंह जी को सपा के आगरा अधिवेशन में आप द्वारा पहनाई लाल टोपी, उनके जिंदाबाद में बाआवाजे बुलंद लगाए आपके नारे, आपके भाई रामगोपाल की उनकी खिदमत में दी गई चिट्ठी एक इबारत है जो मुसलमानों के दिलो दिमाग पर खुद सी गई है. हाँ सपा विधायक सर्वश्री महबूब अली, नवाब इकबाल महमूद, शाहिद मंजूर अब तो आप अमर सिंह पर कल्याण सिंह जी को समाजवादी पार्टी में लाने का इल्जाम नहीं लगा पाएँगे. आगरा के अधिवेशन में दावतनामे की चिट्ठी दे रामगोपाल, इसी अधिवेशन में कल्याण सिंह जिंदाबाद के नारे लगाएं मुलायम सिंह और मेरे साथी विधायाकगण इस इल्जाम में पार्टी से निकलवाएं मुझ बेचारे अमर सिंह को. इस माफीनामे के बाद, क्या आप अब मुलायम सिंह जी को पार्टी से निकाले जाने की मांग कर पाएँगे? कम से कम कल्याण सिंह जी इस बात के लिए शुक्रिया के मुस्तहक है कि उन्होंने खुले तौर पर ऐलानिया कहा कि उनके साहबजादे राजवीर और कुसुम राय जी को वजीर बनाने में और साक्षी महाराज को राज्यसभा में पहुचाने में और एक गुल में साथ-साथ गुलपोश होकर, लाल टोपी पहना कर कल्याण सिंह जिंदाबाद का नारा लगाने के कारनामों में वाहिद अगर कोई जिम्मेदार है तो सिर्फ इज्ज़तमाफ जनाब मुलायम सिंह साहब. और अब अपने इन सभी कारनामो की माफी मांग कर जनाब आपने मुझे अपने गुर्गों द्वारा लगाए गए सभी इल्जामों से बाइज्जत बरी कर दिया है. शुक्रिया, मेहरबानी, मेरे पुराने पहलवान नेता आपके इस नए दाव-पेंच करम और रहम के लिए.

अगर हमारे पहलवान नेता को अपनी गल्ती का अहसास है तो मै कहूँगा कि “देर आए दुरुस्त आए”. लेकिन अगर मुसलमानों को जज्बाती बना कर फिर एक बार उनका वोट तक्सीम करने की सियासी चाल है तो जनाबे आली आप अबकी ज़रा पीछे रह गए क्यूँकी चौरासी के सिक्ख दंगे और नरसिम्हा राव जी के कांग्रेसी निजाम की भूलों की माफी काफी पहले ही कांग्रेस मांग चुकी है. नरसिम्हा राव, कल्याण सिंह, मुलायम सिंह सब बाबरी मस्जिद की शहादत की सियासत में कहीं ना कहीं इकट्ठा दिखाई दे रहे है.अब समाजवादी अपने को बेदाग़ और कांग्रेस को बाबरी के गुनाह के लिए माफी माँगने वाली शर्मिन्दा पार्टी के खिताब से नहीं नवाज सकती. सवाल सिर्फ कल्याण सिंह का ही नहीं शफीकुर्रहमान वर्क, सलीम इकबाल शेरवानी, एच.टी. हसन जैसे कद्दावर मुसलमान नेताओं के टिकट कटने का भी है.

“इक तुम हो कि कस्ती को तूफ़ान में डुबो बैठे,
एक हम है कि तूफ़ान को कश्ती में डुबोते है.”

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