संघर्ष भीषण, उग्र, संवेदनशील, क्रूर और दुःखदायी होता है. बुलन्दशहर के आम क्षत्रिय भईयों ने एवं विधायक नागर ने एक छोटी पांच लाख की राशि एवं पुराने प्रशासन के दो पूर्व नियुक्त क्षत्रिय अधिकारी ठाकुर अभिषेक सिंह एवं क्षत्राणी श्रीमती राधा सिंह की प्रशासनिक सक्रियता और भाई जीतू ठाकुर द्वारा संगृहीत लाखों की राशि ने उदयपुर की बाईस फिट के महाराणा प्रताप की प्रतिमा के बाद साढे ग्यारह फिट की प्रतिमा का निर्माण बुलंदशहर में कर दिखाया. मुझे इस प्रतिमा के अनावरण का कार्यक्रम ११ जुलाई, २०१० को करने का निमंत्रण मिला. उसी दिन लखनऊ में कुंवर हरबंश सिंह के कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता भी था, जहाँ मुख्य अतिथि बसपा मंत्री एवं मेरे पुराने दोस्त भाई बादशाह सिंह मौजूद थे. बुलंदशहर में मेरे आने के कार्यक्रम को लेकर पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया. मुझे अधिकारियों और प्रेस द्वारा ना आने की सलाह दी गई. जीतू ठाकुर को प्रशासन ने बसपा के मंत्री भाई जयवीर सिंह से अनावरण करवाने का दबाव बनवाया. पुलिस बल से बचते-बचाते आखिर मुख्य सड़क की जगह गाँव की नहरों के किनारे का सहारा लेते हुए मै प्रतिमा के अनावरण स्थल पर पहुंचा. अधिकारियों से मैने पूंछा कि मै वकील भी हूँ और बाबा अम्बेडकर जी के बनाए संविधान का जानकार भी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अम्बेडकर जी ने संविधान में प्रत्येक नागरिक को दी है और सन्यासी एवं राजनेता का तो काम ही बोलना और डोलना है. मै अपने बसपाई ठाकुर भाई जयवीर अथवा बादशाह भाई हों या वीर बबलू सिंह विधायक मुख्यमंत्री के सम्मान की रक्षा में विरोधियों का घर तक अपने विरोध की प्रखरता से रौशन कर डालते है, का इस्तेकबाल करता हूँ. मै झंडा, डंडा, दल विहीन लेकिन स्वाभिमान, चेतना और कर्मबोध की कर्मण्यता का संकल्पित छोटा आदमी अपने पुरखे की प्रतिमा को अधिक समय तक कालिमा में नहीं देख सकता.

आज बुलंदशहर के क्षत्रिय स्वाभिमान के लिए सडकों पर थे. बाबा हरदेव गुट के सर्वश्री सूर्यकांत और अनूप भी सडकों पर दिखे. मै तो चाहता हूँ कि कुंवर हरिवंश के बादशाह की भी आज यहाँ बादशाहत होती और यह घोषणा की जाती कि प्रताप का उज्वल चेहरा काले कपड़ों की कालिमा से मुक्त क्षत्रिय स्वाबिमान को पुन्जित करने का कम-काज आज से करेगा और बसपा सरकार यदि “तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार” को छोड़ कर “सर्वजन हिताय और सुखाय” में संलिप्त है तो इस प्रतिमा के सामने बस स्टैंड का नाम भी “प्रताप बस स्टैंड” होगा. ज्योतिबा फूले, माननीय कांशीराम जी और बाबा अम्बेडकर के साथ-साथ यदि क्षत्रिय स्वाभिमान के प्रतीक हमारे पुरखे महाराणा प्रताप की प्रतिमा का अनावरण मैने कर डाला तो क्या यह गुनाह है? मैने सुना है कि प्रतिमा में पुनः कालिमा लग गई है. यदि एक माह के अंतर्गत प्रताप के प्रताप को कालिमा मुक्त कर जनता जनार्दन के लिए लोकार्पित ना किया गया तो मै बुलंदशहर फिर जाऊँगा.

आज आपस में लड़ रहे सभी क्षत्रिय क्षत्रपों को एकजुट होने की जरूरत है, मै क्षत्रिय महासभा के प्रमुख संरक्षक के पद को छोडता हूँ और एक सामान्य क्षत्रिय कार्यकर्ता के रूप में लड़ रहे दोनों गुटों के अच्छे कामों में साथ देने का वचन देते हुए, विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि प्रदेश में बड़ी मूर्तियां सरकारी खर्चे से बन रही है. क्षत्रियों के अपने चंदे से बनी साढ़े ग्यारह फुट की उदयपुर के बाद देश की यह दूसरी बड़ी राणाप्रताप की प्रतिमा के अनावरण से प्रशासन अनावश्यक छेड़छाड बंद करे अन्यथा क्षत्रिय स्वाभिमान की प्रज्वलता की पीड़ा को भुगतने को स्वयं को तैयार रहे. वर्त्तमान सरकार के बसपाई क्षत्रीय मंत्रियों और विधायकों के लिए सिर्फ इतना ही-

“दराज ऐ बूते नादाँ तेरा वह सिन् तो करे,
सितम के तू भी हो काबिल खुदा वो दिन तो करे.”

Bookmark and Share