आज अंगरेजी के एक अखबार में मेरा मंतव्य आया कि यदि मै स्वयं राज्यसभा सदस्य बना हुआ हूँ तो जया बच्चन जी का पुनः राज्यसभा में जाना मुझे बुरा क्यूँ लगा? जया जी कतई राजनीति में नहीं थी और वह राज्यसभा में मेरे द्वारा लाई गई थी. पिछले १४ वर्षों से मैने पार्टी के लिए उतना काम-काज किया जितना किसी भी बड़े या छोटे नेता ने नहीं किया होगा. मैने अमित जी को स्पष्ट कहा था कि आप जयाजी की समाजवादी इच्छा का सम्मान करते हुए मेरा रिश्ता कुर्बान कर दीजिये. परिवार और परिवार की तरह होने का फर्क मुझे श्री मुलायम सिंह जी और जया बच्चन जी दोनों ने ठीक से बता दिया है. यदि अमित जी और अभिषेक के साथ ऐसा कुछ होता तो जया बच्चन जी क्या करती?और यदि मै श्री मुलायम सिंह जी का भाई रामगोपाल यादव होता तो सपा सुप्रीमो क्या करते? जहाँ तक मेरे राज्यसभा का प्रश्न है, मैने स्वयं स्तीफे की पेशकश की थी जिसे सुप्रीमो ने ठुकरा दिया और बाद में फरवरी के माह में मुझे हटाने का पत्र राज्यसभा सचिवालय को लिख मारा. सार्वजनिक जीवन की नैतिकता कथनी और करनी में कोई भेद ना रखने की पद्धति है, जिसके लिए श्री मुलायम सिंह यादव जाने जाते थे. यह सार्वजनिक जीवन की नैतिकता ही तो है कि यूं.पी.ए.-२ की शानदार जीत के बाद इतराने की बजाय जीवन की संध्या में भी जोर-शोर से भाजपा का प्रचार करने के लिए श्री राहुल गांधी ने अडवानी जी की खूब जम कर तारीफ़ की. युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मुझे गाँधी होने का लाभ मिला है. अपने दल के अन्दर आतंरिक लोकशाही के आभाव की बात उन्होंने खुले तौर पर स्वीकार की. यह खुलापन यदि उत्तर प्रदेश की जमीन से उनके कार्यकर्ता जोड़ पाएं तो निश्चित तौर पर २०१२ का उनका मिशन पूरा हो जाएगा. विश्वसनीयता खुलेपन के विचारों से ही बनाती है, जिसका राहुलजी में कोई आभाव नहीं है. आज उनका जन्मदिन है, ईश्वर उन्हें स्वस्थ, प्रसन्न, दीर्घायु रखे और लोगों की मोहब्बत उन्हें नवजे.

“कभी दरिया की लहरों से कभी साहिल से उठता है,
ये नगमा है मोहब्बत का जो आबोगिल से उठता है.”

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