भाई सुरेश कलमाडी जी को मै बहुत वर्षों से जानता हूँ. वह एक हंसमुख, मिलनसार भूतपूर्व सैनिक अधिकारी है. १९७७ में हुई कांग्रेस की सोचनीय पराजय के पश्चात सुरेश जी तत्कालीन युवा नेता श्री प्रियरंजनदास मुंशी के एवं श्री शरद पवार के संपर्क में रहे और इंदिरा कांग्रेस के विरोधी. श्री राजीव गांधी के सत्ताहीन होने पर वह उस समय के उनके अनन्य सहयोगी श्री अरुण सिंह जी के काफी निकट हो गए और उसके तत्काल बाद पुणे में उनका मारुती का एक बड़ा शोरूम खुल गया. कुछ दिनों बाद वह श्री शरद पवार के जीवन में ऐसे ही अभिन्न बन गए जैसे कि आज श्री प्रफुल्ल पटेल है. बाद में पुणे की स्थानीय राजनीति में श्री अजीत पवार की प्रतिद्वंदिता ने उनका हाँथ शरद जी से छुडवा दिया.

श्री सुबीराम रेड्डी और श्री सुरेश कलमाडी की काकटेल पार्टियां बड़ी जोरदार होती थी जिनमे कांग्रेसी सांसद श्रीमती रत्ना सिंह, भाजपाई संगीता सिंह देब, पदमन भैया जैसे “पार्टी प्रिय” वरिष्ठ अधिकारी, पटियाला के राजा रणधीर सिंह और गाहे बगाहे मै भी चला जाता था. वैभव का क्रूर अट्टाहास और अहंकार की अट्टालिका का समन्वय होती थी ये पार्टियां. कुछ दिनों बाद बुलाने पर भी मैने जाना बंद कर दिया और उन्होंने बुलाना भी बंद कर दिया.

“हमसे आया ना गया, उनसे बुलाया ना गया, फासला प्यार का दोनों से मिटाया ना गया.”

अब सर्वप्रथम मेरे मित्र मणिशंकर अय्यर, फिर सी.वी.सी., सी.बी.आई, खेलमंत्री एम्.एस. गिल और अंत में लन्दन स्थित ब्रिटिश उच्चायुक्त तक ने कुछ ऐसे ब्यान दे डाले है कि भाई सुरेश कलमाडी भले ही कलमाडी हो पर भारतीय खेलों की छवि के लिए “कैलामिटी” बन गए है. खेल का वाणिज्य महँगा पडता है. जिसने ऐसा किया विवादित हुआ वह चाहे कलमाडी हो या फिर ललित मोदी. खेल एक राष्ट्रीय भाव और सम्मान है जिसके साधन-आभाव को दूर करने हेतु भले ही कारपोरेट स्पांसरशिप ले लें लेकिन जब खेल कारपोरेट किटी की बैलेंसशीट को पेत्रोनाईज करे तो फिर खेल के खतरों के नए खिलाड़ी ललित मोदी और सुरेश कलमाडी (या कैलामिटी) के रूप में सामने खड़े सिस्टम, सरकार और समाज को मुह चिढाते है. सुरेश भाई के काम-काज को देश की जनता कुछ इस तरह पहचान रही है.

“आदमी पहचान लेते है कयाफा देख कर, खत का मजमून भांप लेते है लिफाफा देख कर”

यह ब्लॉग मैने आज १०३ डिग्री बुखार में इलाहाबाद कार्यक्रम में करके लौटते हुए जहाज में लिखा. नौजवानों का भारी हुजूम, उनकी आँखों में जातिवाद, परिवारवाद से कुछ अलग कुछ करने का जज्बा, हज़ारो गाड़ियों और मोटर साईकिलों के काफिले ने मेरे चहरे पर मुस्कान ला दी. सिंगापुर के मेरे डाक्टर श्री लाई ने तुरंत मुझे बुलाया है. मेरे स्थानीय डाक्टरों ने आज मुझे बिस्तर ना छोडने की सलाह दी थी. हद तो तब हो गई जब मेरे अपने हिमायती भी मुझे ईलाहाबाद इस तबियत में आने पर डाटने लगे. लेकिन यह डाट “मीठी डाट” थी वैसे ही जैसे कि मेरी पुरानी भाभी को मेरी और मेरे दल के शीर्ष नेतृत्व की हर तल्खी “मीठी दुश्मनी” लगती थी. राज्य का एक प्रमुख विरोधी दल रो रहा है, मै कहता हूँ, अनायास क्यों?

“रोएँ हम बज्मों को क्यों, अपने दिनों के फेर है,
शाने सियासते महफ़िल थे जो कल राख के अब ढेर है”

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