बंगाल निकाय चुनावो में कुमारी ममता बनर्जी की भारी जीत ने एक बार फिर बताया है कि स्थानीय नेतृत्व कितना महत्वपूर्ण होता है. ममता सत्तर के दशक में श्री सिद्धार्थशंकर राय मंत्रिमंडल के पूर्व मंत्री श्री सुब्रत मुखर्जी के साथ राजनीति में सक्रिय थी. श्री सोमनाथ चटर्जी के विरुद्ध कोई उम्मीदवार न मिलने पर उन्हें अंतिम समय में लड़ाया गया और वह विजयी हुई थी. इस चुनाव में बड़े-बड़े धुरंधरों को अपेक्षाकृत छोटे कदों के लोगों ने हराया था. सोमनाथ दादा ममता जी से, अटल बिहारी जी माधवराव सिंधिया जी से और बहुगुणा जी अमिताभ बच्चन जी से हार गए थे. इन चुनावों के बाद कामरेड ज्योति बसु जी का प्रसिद्द बयान आया था कि मृत इंदिरा गांधी जीवंत इंदिरा गाँधी से कहीं ज्यादा ताकतवर है. बाद के दौर में श्री अरुण नेहरु की राजनीति खूब चमकी और उत्तर प्रदेश में कमलापति त्रिपाठी के परिवार के मुकाबले श्री वीर बहादुर सिंह, मध्यप्रदेश में श्री शिवभान सिंह सोलंकी के मुकाबले श्री अर्जुन सिंह और बंगाल में अन्यान्य प्रतिष्ठित नेताओं के मुकाबले श्री अशोक कुमार सेन जो कि सक्रिय राजनीति से दशकों से दूर थे, आगे लाए गए.

स्वतन्त्रता के बाद कांग्रेस का राज्य स्तरीय नेतृत्व भी काफी कद्दावर था. श्री गोविन्द वल्लभ पन्त, श्री सम्पूर्णानंद, श्री सी.बी. गुप्त, बहुगुणा जी और कमलापति जी उत्तर प्रदेश के नेतृत्व में जब तक रहे, कांग्रेस की जड़े खोखली ना हो पाई. श्री यशपाल कपूर के प्रभाव से श्री कृष्ण कुमार बिरला जी के राज्य सभा चुनाव की हार के बाद के घटनाक्रमों ने बहुगुणा जी की उत्तर प्रदेश से विदाई कराई. बाद में बहुगुणा जी की कांग्रेस में घरवापसी हुई पर पहले वाली बात ना रह पाई. चिकमंगलूर के चुनाव में कड़ी लड़ाई लड़ने वाले वीरेंद्र पाटिल की मजबूती को इंदिरा जी समझी और बावजूद इस तथ्य के कि श्री वीरेन्द्र पाटिल स्वयं इंदिरा जी के विउद्ध लड़े थे, उन्हें ससम्मान कांग्रेस में शामिल कर कैबिनेट मंत्री बनाया.

समन्वय और संपर्क की शून्यता ने धीरे-धीरे कांग्रेस में स्थानीय नेतृत्व को कमजोर किया और इस खालीपन को क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों ने भरकर देश की राजनीति विकृत की. लेकन क्या कांग्रेस इस विकृति से स्वयं को अलग रख सकती है? वाई.बी. चवन, रजनी पटेल, एस.के. पाटिल, अतुल्य घोष, विधानचंद्र राय, विजय सिंह नाहर, निजलिंगप्पा, कामराज नाडर की बात जाने दे, गांधी नेहरू की जोड़ी के अलावा लाल (लाजपत राय), बाल (गंगाधर तिलक), पाल (सुरेन्द्रनाथ), मौलाना आज़ाद, देशबंधु चितरंजन दास, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, बाबू जगजीवन राम, ऐसे तमाम वरिष्ठ राज्यस्तरीय नेता ही राष्ट्रीय नेतृत्व की मुख्य धारा में थे और इन सब के सामूहिक त्याग और बलिदान से देश की आजादी की जंग लड़ी गई. हाँ, यह अलग बात है कि खुलेआम हरिपुरा कांग्रेस में गाँधी जी ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को हराने के लिए पट्टाभि सीतारमैया को ना सिर्फ खडा किया बल्कि यह खुला बयान भी दिया कि सुभाष बाबू की जीत और पट्टाभि की हार गांधी जी की व्यक्तिगत हार होगी. सुभाष बाबू गाँधी जी के विरोध के बावजूद भी जीत तो गए परन्तु कांग्रेस में टिक ना पाए. ठीक ऐसे ही वर्षों बाद इंदिरा जी के विरोध के बावजूद श्री चंद्रशेखर जी शिमला अधिवेशन में कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य चुने तो गए पर आपातस्थिति आते ही उन्नीस महीने के लिए कारागार गए. राहुल गाँधी जी ने कई बार गाँधी होने के लाभ को स्वीकार करते हुए कांग्रेस में आतंरिक लोकशाही की कमी की बात को मानते हुए अपने दल में चुनाव की प्रक्रिया को सबल करने का संकल्प बार-बार दुहराया है. शायद अभी नहीं, परन्तु राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस विभिन्न राज्यों में स्थानीय नेतृत्व वापस लाएगी, ऐसा मेरा सोचना है और विष्वास भी. पता नहीं लोगों को तब तक सब्र भी रहेगा या नहीं पर मै तो यही कहूंगा,

“आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक,
कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक.”

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