बोलना और डोलना सन्यासी और राजनेता का कर्म और धर्म है. प्रश्न यह है कि बोले क्या, और जनाब आप डोले कहाँ? अगर आपके बोलने और डोलने की डगर ठीक है तो आपको रमेश भाई, मुरारी बाबू की भांति अध्यात्मिक शिष्य और राजनीति में है तो असंख्य प्रशंसक मिल जाएँगे. जरूरी नहीं है कि आपके धार्मिक सत्संग का श्रवण करने वाले श्रोता संत प्रवत्ति के हो जाएँ और यह भी आवश्यक नहीं कि आपकी रैली में उपस्थित रेला आपका मतदाता बन आपको सत्ता के शिखर पर पहुंचा दे. बोलना, डोलना, भीड़, प्रशंसा, इलेक्ट्रानिक मीडिया की टी.आर.पी., अखबारों की सुर्ख़ियों में लगातार छपता आपका नाम एक स्तर के बाद आपको वियोगी बना देते है और आप आप अपनी ही व्यक्तित्व से डरे-सहमे, दबे-कुचले, छिपे-छिपे फिरते हुए कहते है, यार कोई देख ना ले, कोई सुन ना ले, अरे भई कहीं कोई छाप ना दे.

आज कांग्रेस के एक बड़े पदाधिकारी भाई जनार्दन द्विवेदी का प्रपत्र जिसमे अनावश्यक बोलने पर पाबंदी लगाई गई है, के बारे में सूना, अच्छा लगा. आप कहेंगे कि अब तो आप खूब चर्चित और परिचित हो गए लेकिन एक राष्ट्रीय दल के इस दौरे पाबंदी से आपके व्यक्तित्व के कृतित्व का बखान कैसे होगा. एक क्षेत्रीय दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में मेरा अपना बोलना काफी विवादों की जड़ बना. कौन मानेगा कि ओठ मेरे थे पर बोल तब के मेरे पुराने मालिक के. दिल किसे दिखता है लोग तो चेहरा देखते और पढते है और अवधारणा बना लेते है जो बाद में सत्य बन कर आपको अनंतकाल तक घेरे रखता है. आज के गृहमंत्री जब वित्तमंत्री थे दल की तरफ से उन पर हमला का आदेश हुआ, मै सिपाही क्या करता? अब वित्तमंत्री जी गृहमंत्री है और उनके दो अनन्य घनिष्ठ मेरे भी घनिष्ठ है. उनके माध्यम से मुझे लगता है की बाणों के तीर से अधिक शब्दों के तीर घातक होते है. फिर भाई राजीव शुक्ल जी के न्यूज-२४ चॅनल की लाइब्रेरी है, तुरंत मेरे अतीत के शब्दों के पुलिंदों को मेरे वर्त्तमान से संदर्भित करते हुए एक गरमागरम खबर बनेगी “अमर वाणी तब और अब”. अतएव वाणी को विराम और आराम और शब्द वही उच्चारित हो जो वापस ना लेने पड़े. इस सन्दर्भ में अपने एक राजनैतिक उत्तरदायित्व के निर्वहन की समाजवादी प्रक्रिया में मेरे द्वारा अब तक हुए सत्यव्रती आचरण के लिए मै सार्वजनिक खेद व्यक्त करते हुए इतना ही कहूँगा कि “चुप्पी सोना और बोलना चांदी”.

अब मेरे कुछ साथी यह ना समझ बैठे कि यह मेरी संस्कृति का बदलाव है, यह तो मात्र जीवन में हुई अच्छी और बुरी अनुभूतियों की परिणिति है. बचपन, जवानी, बुढापे की तरह जीवन का कर्म चक्र भी बदलता है. कांग्रेस, समाजवादी, लोकमंच, अरे अभी तो आगाज है मेरे अंजाम का तो पता मुझे खुद भी नहीं है,

“दिल में हजार तरह के औहाम छा गए, ये तुमने क्या किया मेरी दुनिया में आ गए”

स्वास्थ कारणों से चार-पांच दिन विदेश में हूँ. शरीर के अंदर बाहरी रोगों से लडने की छमता को “इम्यूनिटी” कहते है. मेरे शरीर में लगी किडनी फेल ना हो इसलिए शरीर की इस छमता को कमजोर रखने की दवा लेता हूँ. डाक्टर कहते है तनावमुक्त रहो, भीड़ से दूर रहो, लोगों से कम मिलो पर मै इसका ठीक उल्टा करता हूँ क्योंकि करूँ क्या मेरे रकीब कहते है.

“अयादत को मेरी आ कर वो ये ताकीद करते है, तुझे हम मार डालेंगे नहीं तो जल्द अच्छा हो.”

अल्लाह! मेरी सियासी बीमारी कब अच्छी हो. काश अच्छी हो वरना वो मुझे मार डालेंगे.

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