पिछले हफ्ते राजीव जी का जन्म दिन था. मेरी उनसे कुल एक मुलाक़ात थी. भाई गुलाम नबी आजाद के घर पर वह कई बार समाजवादी दल के प्रमुख से मिलते-जुलते थे और आखरी मुलाक़ात में साथ का वादा करके समाजवादी पार्टी ने सीधे प्रातःकाल राज भवन जा कर उत्तर प्रदेश की सरकार निरस्त करवा दी. ऐसा क्या था कि सपा सुप्रीमो से ले कर स्वर्गीय वी.पी सिंह तक कई निराशाएं राजीव जी के हाँथ लगी. असल में मेरे आंकलन में राजीव जी राजनेता थे ही नहीं, वह एक सज्जन, निर्मल एवं सह्रदय संवेदनशील व्यक्ति थे. आर्थिक उदारीकरण का श्रेय चाहे जो भी ले गया हो उसका बीजारोपण उन्होंने ही किया था, पंचायती राज व्यवस्था की नीव भी उन्होंने ही रखी थी. सोनिया जी द्वारा प्रस्तावित नारेगा योजना में कहीं ना कहीं, राजीव जी द्वारा मुम्बई कांग्रेस में व्यक्त उदगार कि “आम आदमी तक सरकारी योजनाओं का अधिकाँश धन नहीं पहुंच पाता”, उनकी इस उक्ति का प्रभाव अवश्य प्रेरणा श्रोत रहा होगा. १९८२ एशिआड बिना किसी झमेले के जिस सुचारू तरीके से निबटा उससे श्री सुरेश कलमाडी को सीख लेनी चाहिए. निश्चित रूप से राजीव जी स्वान्तः सुखाय अपनी मरजी से नहीं बल्कि देश सेवा की अनंत और असीमित संभावनाओं को ह्रदय में समेटे हुए मजबूरी में हमें छोड़ कर इस दुनिया से गए, उन्हें याद रखना एवं आतंकवाद के राक्षस से निरंतर लडने रहना ही उन्हें हमारी सच्ची श्रद्धांजली होगी.

मुझे सोनिया जी और राहुल जी के चरित्र में भी यही राजनैतिक अल्हडपन दिखता है. ममता बनर्जी जी के सिंगुर आंदोलन में मैने भी बढ़-चढ कर शिरकत की थी. ठीक उसी दौर में प्रधानमंत्री निवास पर समाजवादी-कांग्रेस समन्वय दल की बैठक में श्रीमती सोनिया गाँधी जी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी, वित्त मंत्री प्रणब दा, रक्षामंत्री ए.के, अंटोनी जी, प्रधानमंत्री सचिवालय के राज्यमंत्री श्री प्रथ्वीराज चौहान जी, सोनिया जी के राजनैतिक सचिव श्री अहमद पटेल जी, मेरे तब के नेता श्री मुलायम सिंह जी और मै मौजूद थे. किसी सन्दर्भ में ममता जी द्वारा किसानो के समर्थन में किये जा रहे आंदोलन और सुप्रसिद्ध टाटा उद्योग समूह के हितों की बात आने पर सोनिया जी ने स्पष्ट रूप से ममता जी के समर्थन में जोरदार वकालत करते हुए किसानों के हितों को ध्यान में रखने की सलाह दी थी.

गंगा और यमुना के मिलन पर पावन संगम की उत्पत्ति होती है. गंगा एक्सप्रेस हाईवे और यमुना एक्सप्रेस हाइवे के भ्रष्टाचार के संगम पर माया-मुलायम-जे.पी. के गठजोड पर बने संगम पर उत्तर प्रदेश में पश्चिम बंगाल की तर्ज पर कही एक नया सिंगुरी आंदोलन ना खडा हो जाए. ११८२ उजड़े गाँव, २५० नोटीफाइड गाँव और १.५ करोड उजड़ी जनता यमुना एक्सप्रेस हाइवे की चपेट में आएगी. राष्ट्रपिता कहते थे कि भारत की आत्मा गाँवो में बसती है. यहाँ भारत की आत्मा यानी भारत के गाँव का शहरीकरण पर्यटन के नाम पर किया जा रहा है. मुझे ताज्जुब नहीं होगा यदि जयप्रकाश जी इस परियोजना को ताज पर्यटन विकास के नाम पर “लास वेगास” बनाकर पेश ना कर दे. मुआवजे के रकम की गाड़ी और फटफटिया कितने दिनों तक चलेगी. धरती किसानो की माँ होती है और किसान अपनी इस माँ के गर्भ से कृषि उत्पादन का हीरा-मोती पुश्त दर पुश्त निकालता रहा है. वेतन आयोग यदि कर्मचारियों के वेतन की वृद्धि करता है तो दिल्ली के केन्द्रीय सचिवालय से लखनऊ के हज़रतगंज में बैठे बाबू को एक सी वृद्धि तनख्वाह में मिलती है. जब यमुना एक्सप्रेस वे एक परियोजना , सरकार वही एक दल बसपा की, मुख्यमंत्री इकलौती मायावतीजी और ठेकेदार इकलौता सेठ जयप्रकाश गौड़ तो नोएडा में एक दाम, टप्पल में दूसरा और आगरा में तीसरा दाम क्यों? यानी किसानों को दिए जाने वाले मुवावजे में दोगलापन नहीं तिगलापन, कैसे चलेगा? यह सुखद संयोग रहा कि मैने अनायास टिप्पणी की कि राहुल जी यहाँ टप्पल आएं और बिना सुरक्षा के किसानों के दर्द का मर्म लिए मेरे टप्पल पहुँचने के तीन घंटे के अंदर ही बिना किसी ताम-झाम के बारिश में भीगते राहुल जी किसानों के बीच दिखाई दिए.

पर्यावरण मंत्री भाई जयराम रमेश जी, आप तो बहुत तेज है, अब इस परियोजना में उजडते गाँव के कट रहे पेड़ों को बचाने के लिए ही पर्यावरण की दी गई स्वीकृति बराए करम रद्द कर दें, शायद किसानों की माँ यानी उनकी जमीन की लाज लुटने से बच जाए और वो आपको दुवाएं दें. इस परियोजना की परिकल्पना मायावती जी की पुरानी सरकार ने की थी और ढाई साल बाद जाते-जाते मुलायम सिंह जी ने इस पर मोहर लगाई थी. इसलिए यह भ्रष्टाचार माया-मुलायम-जे.पी. गठजोड का संगम है. उस समय मुलायम सरकार एवं पार्टी का हिस्सा होने के कारण, अपनी गल्ती मानते हुए मैने टप्पल में किसान भाइयों से सार्वजनिक माफी भी माँगी. इतनी जागरूकता कल टप्पल के बाद आगरा में दिखी कि मुझे लगता है कि किसानों की बोली माया सरकार की गोली पर भारी पड़ेगी क्योंकि,

“इतने बाजू इतने सर गिन ले दुश्मन ध्यान से, जीतेंगे हम हर बाजी जो खेले अपनी जान से”

और हाँ अंत में राहुल जी को किसानों के संघर्ष में शामिल होने के दृढ़ संकल्प पर मेरी हार्दिक बधाई.

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