प्रिय मित्रो, कल मै विदेश से सीधे मुंबई पुत्रवत फरहान आज़मी का चुनाव प्रचार करने पहुँच रहा हूँ, शायद कल मैने आपसे यही बात कही थी. मेरे लिए फरहान और अखिलेश में उसी तरह से कोई अंतर नहीं है जिस तरह से उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र मेरे लिए एक सामान है. जिस तरह से उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की प्रगति से सारे देश की प्रगति होती है उसी तरह से अखिलेश और फरहान जैसे युवा नेताओ के आगे बढ़ने से राजनीति आगे बढती है.

पिछली कुछ पोस्ट्स में मैने अपनी पार्टी की कुछ कार्य शैलियों  की आलोचना की थी. मै उन मुद्दों पर आज भी कायम हूँ. परन्तु यह सभी वैचारिक मुद्दे है और मै समझता हूँ कि समय के साथ मेरे नेताओ को भी मेरी बात समझ में आयेगी और पार्टी में कुछ वांच्छित परिवर्तन किये जाएँगे. समय बदल रहा है आज हम २१वी  सदी के पहले दशक के अंत में है, जो काम जिस तरह से १९९० के दशक में होता था वह अब वैसे नहीं हो सकता है. अब शायद सेल फ़ोन की जगह फिक्स लाइन फ़ोन का इस्तेमाल करने से हमारे जीवन  के तार ही टूट जाए, ई-मेल की जगह डाकिये से चिठ्ठी जाने पर शायद शादी के बाद निमंत्रण पहुचे, हवाई जहाज़ की जगह ट्रेन से हार्ट के मरीज को ले जाने से शायद वह इलाज होने के पहले ही मर जाये. इसलिए, नए ज़माने में जीने के लिए नए तरीको को अपनाना अनिवार्य है नहीं तो हम बहुत पीछे छूट जाएँगे. महान राम मनोहर लोहिया जी अगर आज की तारीख में सप्तक्रान्ति   लिखते तो उसका स्वरुप कुछ और होता, शायद उनकी समाजवाद की परिभाषा भी कुछ अलग ही होती. इसलिए मेरी अपनी पार्टी के समाजवादी पुरोद्धाओ से हाथ जोड़ कर विनती है की वह नए ज़माने की जरूरतों को समझे और समाजवाद के बहुमूल्य दर्शन को उसी तरह से परिभाषित करे अन्यथा हम अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों से बहुत पीछे छूट जाएँगे.

जान कर के काफी निराशा हुयी कि हमारी पार्टी का प्रदर्शन विधान परिषद् चुनावो में बहुत ही निराशाजनक रहा. इन परिणामो से मुझे काफी आश्चर्य हुआ क्यूंकि मुझे लग रहा था कि शायद मेरे इन चुनावो से दूर रहने से ९८% पार्टी के कार्यकर्ता, जो कि तथाकथित रूप से मेरे इस्तीफे से काफी खुश है, तन, मन, धन के साथ मेहनत करके कम से कम बलिया, देवरिया और इटावा में तो पार्टी को विजयी बना देते. लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो इससे मै क्या निष्कर्ष निकालू, जवाब मै आप पर छोड़ता हूँ. इन परिषद् चुनावो मे पार्टी के सिर्फ एक मात्र  सफल उम्मीदवार श्री अक्षय प्रताप सिंह है जो कि मेरे काफी नजदीक समझे जाते है और वह शायद उन २% सपा कार्यकर्ताओ मे है जो मेरे समर्थक है.  मेरी समझ से आप लोग मेरी इस बात से सहमत होगे कि उपचुनाव और परिषद् चुनावो में जिस तरह से सत्ताधारी दल ने विजय प्राप्त की है वह किसी भी रूप में प्रदेश की वास्तिविक  जनभावना का परिचारक नहीं है. आज सारा उत्तर प्रदेश जल रहा और जनभावना पूर्ण रूप से बसपा सरकार के खिलाफ है परन्तु सिर्फ अपनी कमियों की वजह से हमारा दल इसका राजनैतिक लाभ नहीं ले पा रहा है. मुझे उम्मीद है कि इन परिणामो से मेरे दल के कर्ता-धर्ता कुछ सीख लेगे और आने  वाले समय में वांछित परिवर्तन करके पार्टी को सही दिशा में ले जायेंगे.

मीडिया  में शायद कही कहा गया कि मैने नेताजी और उनके परिवार की आलोचना की है, यह बात सरासर झूठ और बिना सर-पैर की है. राजनीति से अलग हट कर, नेता जी, शिवपाल भाई, बेटे सामान  अखिलेश, और रामगोपाल भाई के साथ मेरे वर्षो पुराने व्यक्तिगत सम्बन्ध रहे है. इन संबंधो ने हर तरह के मौसमों की मार झेली है, यह सम्बन्ध सारी दुनिया और राजनीति से अलग हट करके है. मै सपा की राजनीति करू या किसी और दल की, मै सपने में भी इस परिवार के खिलाफ कुछ नहीं बोल सकता हूँ. मैं क्षत्रीय धर्म का पालन कर रहा हूँ और वचन के मुताबिक नेताजी के परिवार के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलूँगा, ”रघुकुल रीति सदा चलि आयी प्राण जाएँ पर वचन न जाई”.    हां मेरे बड़े  भाई कुछ  दिनों से मीडिया में कुछ ऐसी बाते जरूर कर रहे है जिससे मेरा दिल रो पड़ा. लेकिन मैने फिर भी उनके बारे में कुछ भी गलत नहीं बोला और मर्यादा में रह कर सिर्फ अपने दुःख का इज़हार किया. हां मेरी पार्टी में कुछ पुराने समाजवादी जरूर है जो मुझे अपनी आँख की किरकिरी समझते है और मुझ पर प्रहार करने का कोई भी मौका नहीं चूकते है. ऐसे ही मेरे एक मित्र ने मेरे इस्तीफे के बाद न जाने क्या क्या कह डाला, मैने अपनी ब्लॉग में उनके बारे में जो कुछ भी कहा मै उस पर अभी भी कायम हूँ. पैसे के लेन-देन की बात ब्लाग मे लिखने पर कुछ लोगो ने मेरी आलोचना भी की. मै यहाँ पर स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरे द्वारा इस बात को कहने के काफी पूर्व ही मोहन सिंह जी ने बनारस की एक गोष्ठी में मेरे से पैसे लेने की बात कह कर अफसोस जाहिर करते हुए मेरी वजह से समाजवाद पर पूंजीवाद के हावी होने की बात कही थी, इसलिए कृपया इस वाक् युद्ध के लिए मुझे दोषी न ठहराइये.

नेता  जी कहते है कि चुप रहना सोना होता है और बोलना चांदी, मैने उनसे सीख ले कर सोना बनने की पूरी कोशिश की पर शायद उनका कोई नज़दीकी ही उनके इस कथन के दर्शन को नहीं समझ सका. यहाँ पर मै पुत्रवत अखिलेश की तारीफ़ करना चाहूँगा. इस प्रकरण के दौरान हमारी पार्टी के एक सांसद श्री राधेमोहन सिंह, जो कि तथाकथित रूप से मेरे काफी नजदीक समझे जाते है,  ने जब अखिलेश के पास जा करके कहा कि वह उनके साथ है तो अखिलेश ने उनको दोटूक जवाब देते हुए कहा कि न आप मेरे साथ रहे न ही अंकल के साथ, आप कृपया पार्टी के साथ रहे.  अखिलेश बहुत ही सरल स्वाभाव के मालिक है और ३ बार सांसद बनने के बावजूद राजनीति की कुटिलता से अभी भी कोसो दूर है. उनमे अपने और पराए में अंतर करने कि छमता कूट-कूट कर भरी है, मुझे लगता है कि बड़ा होने के बावजूद शायद परिवार के कुछ लोगो को उनसे सीख लेने की ज़रुरत है. मुझे उम्मीद है अखिलेश अपने व्यक्तित्व के इस पहलू को बचा कर रखेंगे. मै जहा भी जिस हाल में रहू हमेशा कमना करूँगा कि उनका भविष्य उज्वल हो और वह फूले फले.

मै पार्टी के अपने समर्थको का तहे दिल से धन्यवाद देना चाहता हूँ कि वह इस मुश्किल समय में मजबूती के साथ मेरे साथ खड़े रहे. जिस तरह से मैने इस प्रकरण में मर्यादा का पूरी तरह से पालन किया उसी तरह से मेरे समर्थको ने भी मेरा अपमान होने पर विद्रोह के स्वर तो जरूर उठाए पर किसी मर्यादा का उन्लन्घन नहीं किया. मेरे बड़े भाई और उनके कुछ समर्थको ने तो कोई कसर नहीं छोडी, मुझे जी भर के कोसा और हर तरह से अपमानित भी किया पर मै गर्व पूर्वक कह सकता हूँ कि मेरे समर्थको ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला.

आज मेरी नेताजी के परिवार के साथ फोन पर बात हुयी, इस वार्तालाप के दौरान न सिर्फ उनकी आँखों में आंसू आ गए बल्कि मेरी आँखे भी नम हो गयी. वह शायद पार्टी के लिए खून जलाने और गुर्दा ख़राब करने वाले इस अदना कार्यकर्ता का दर्द समझते है. उनसे बात करने के बाद लगा कि शायद मुझे गीता के उस ज्ञान का आत्मसात करना पड़ेगा जिसमे कि कर्तव्य पथ पर निर्मोही हो कर आगे बढ़ने की बात कही गयी है.

जैसा मैने वादा किया था मै पुत्रवत फरहान के प्रचार के लिए मुंबई जा रहा हूँ, उसके बाद मेरे व्यक्तिगत और राजनैतिक जीवन का अगला पड़ाव कहा होगा मुझे खुद पता नहीं है…..

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